अधिकमास का महत्व हिंदू धर्म में

धार्मिक दृष्टि से अधिकमास का बहुत बड़ा महत्व है। इसे मलमास तथा पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। अधिकमास हर तीन साल में एक बार आता है। हिन्दू धर्मावलम्बी इस माह में विशेष रूप से भागवत कथा, विष्णु पुराण, पूजा-पाठ, जप योग आदि धार्मिक काम करते है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अन्य महीनों की
तुलना में अधिक मास में पूजा, जप, तप करने से 10 गुना पुण्य की प्राप्ति होती है। अधिक पुण्य की चाह में हिन्दू धर्मावलम्बी इस माह की बेसब्री से प्रतीक्षा करते है।

अधिक मास हिन्दू कैलेंडर में एक अतिरिक्त माह है, जो चंद्र और सौर कैलेंडर को नियंत्रित करता है। यह स्थिति हर तीन साल में या 32.5 महीने में आती है। इस कारण माह में भी बदलाव आता है। विगत वर्ष 2020 में यह अश्विन मास यानी वेस्टर्न कैलेंडर के मुताबिक सितंबर माह में मनाया गया।

अधिक मास का दूसरा नाम मलमास है। पूर्व में यह नाम इसलिए सामने आया, क्योंकि अधिक मास को 13वें माह के तौर पर लिया गया था। अधिक मास को भगवान विष्णु के घर के रूप में भी जाना जाता है। उन्हें एक दूसरे नाम पुरुषोत्तम के नाम से भी जाना जाता है और अधिक मास को भी पुरुषोत्तम मास के रूप में जाना जाता है।

अब आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि आखिर क्यों यह माह इतना महत्वपूर्ण है। अधिक मास को सौर और चंद्र की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाला माना जाता है। हालांकि कोई भी भगवान इस अतिरिक्त माह को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। ऐसे में सभी ने भगवान विष्णु से इस माह को अपनाने की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और तभी से यह मास पुरुषोत्तम मास के रूप में जाना जाता है।


अधिक मास के वैज्ञानिक कारण

अधिक मास लगने के धार्मिक तथा वैज्ञानिक कारण दोनों है। सूर्य वर्ष तथा चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए अधिक मास आता है। हिंदू कैलेंडर की गणना भी सूर्य वर्ष तथा चंद्र वर्ष की गणना के आधार पर की जाती है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिनों का होता है। सूर्य वर्ष का आशय पृथ्वी द्वारा सूर्य के एक चक्कर लगाने में 365 दिन छह घंटे लगते है। वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। चंद्र वर्ष का आशय चंद्रमा द्वारा पृथ्वी का चक्कर लगाने में 354 दिन लगते है। दोनों ही वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। सूर्य वर्ष तथा चंद्र वर्ष के बीच अंतर के संतुलन बनाने के लिए अधिक मास के रूप में एक अतिरिक्त मास का निर्माण होता है।

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नहीं होता कोई मांगलिक अनुष्ठान

हिंदू धर्म में अधिक मास के दौरान सभी प्रकार के मांगलिक कार्य वर्जित है। इस दौरान शादी, विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार, नई वस्तुओं की खरीदारी आदि वर्जित रहती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक माह अधिक होने के कारण यह माह मलिन हो जाता है, इसलिए लोग इस धारणा को मानते हुए शुभ मांगलिक कार्य नहीं करते ।


भगवान विष्णु का प्रिय पुरुषोत्तम मास

शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री विष्णु को अधिकमास का स्वामी माना गया है। इस मास का नाम भगवान विष्णु के नाम पर पुरुषोत्तम पड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि महर्षियों ने अपनी गणना में प्रत्येक चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए है। लेकिन सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए उत्पन्न अतिरिक्त मास के आराध्य बनने के लिए कोई देवता तैयार नहीं हुए। ऐसे में ऋषि-मुनि इस समस्या के निवारण के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे। जहां सभी ने इस मास का भार भगवान से अपने ऊपर लेने का अनुरोध किया। इस पर भगवान विष्णु ने ऋषि मुनियों के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार वे उन्हाेनें अपना नाम इस मास के साथ जोड़ दिया। इसलिए अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। भगवान श्री कृष्ण तथा भगवान नरसिंह का इस मास से बहुत गहरा संबंध रहा है। पौराणिक कथाओं में भगवान नरसिंह ने अधिक मास में ही हिरण्यकश्यप का वध करके पृथ्वी को बचाया था।


अधिकमास का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास में ध्यान, जप, तप, योग करना काफी फलदायी होता है। शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर सभी जीवों का निर्माण पांच तत्वों से मिलकर बना है। इन पांच तत्वों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी शामिल है। इस मास में प्रत्येक जीव अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों के जरिए अपने भौतिक और आध्यात्मिक विकास काे प्राप्त करता है। इस मास में कुंडली दोष का भी निवारण किया जाता है। इस दौरान कुंडली में कमजोर ग्रह होने संबंधी दोष ठीक हो जाते है।


अधिक मास में क्या करें, क्या न करें

  • अधिक मास भगवान विष्णु का महीना होता है। इसके साथ ही उनके दो अवतार भगवान कृष्ण और भगवान नरसिंह भी अधिक मास से जुड़े हुए हैं। इस माह में उनकी पूजा करना फलदायी रहता है।
  • इस महीने में भगवान पुरुषोत्तम की पूजा करने और उपवास करने से भक्तों काे दुख, गरीबी और पापों से मुक्ति मिलती है।
  • इस माह भक्तों द्वारा धार्मिक ग्रंथों जैसे ‘विष्णु पुराण’, ‘श्रीमद भागवतम’ और ‘भागवत गीता’ का अध्ययन करने से विशेष फल मिलता है।
  • यह माह दान पुण्य करने वाला महिना माना जाता है।
  • ऐसा माना जाता है कि इस पूरे महीने विष्णु मंत्र का जाप करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और सभी पापों को क्षमा कर देते हैं।
  • इस महीने उपवास रखने वाले लोगों काे दिन में एक बार भोजन करना चाहिए। इसके अलावा, खाया जाने वाला भोजन सात्विक होना चाहिए, क्योंकि यह हमारे शरीर को आध्यात्मिक रूप से भगवान से जुड़ने में मदद करता है।
  • स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह महीना बेहद मददगार होता है, क्योंकि यह आपको ताजी ऊर्जा से भर देता है। साथ ही आंतरिक और बाहरी रूप से शुद्ध करने में मदद करता है।