भगवान ब्रह्मा से जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी

सनातन धर्म में भगवान ब्रह्मा को परमपिता परमात्मा के रूप में संदर्भित किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि ब्रह्मांड में मौजूद सभी जीवित प्राणियों के मूल स्रोत और निर्माता भगवान ब्रह्मा ही हैं। वैदिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान ब्रह्मा देव, दानव, मनुष्य सहित सभी सजीव और निर्जीव वस्तुओं के जन्मदाता हैं। वे हिंदू धर्म के मूल स्तंभ हैं और सृष्टि के तीन मुख्य चक्र सृजन, पालन और विनाश में से सृजन के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन हम सभी यह भी जानते हैं कि हिंदू धर्म में भगवान ब्रह्मा की अधिक पूजा नहीं की जाती है। और शायद यही कारण है कि हमें भगवान ब्रह्मा के बारे में बहुत ही सीमित जानकारी है। क्या आपको पता है, भगवान ब्रह्मा कहां रहते हैं या ब्रह्मा क्या करते है? ब्रह्मा की पत्नी कौन है? ब्रह्मा का जन्म कैसे हुआ? ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती? या ब्रह्मा के चतुर्मुख का अर्थ क्या है? भगवान ब्रह्मा से जुड़े इन्ही सवालों का जवाब हम इस लेख के माध्यम से देने का प्रयास कर रहे हैं।


भगवान ब्रह्मा कौन हैं?

हिंदू धर्म के अनुसार, ब्रह्मा एक ऐसे देवता हैं जिन्होंने दुनिया और दुनिया की हर चीज की रचना की है। वह हिंदू धर्म के त्रिमूर्ति देवताओं में से एक है, अन्य दो शिव और विष्णु हैं। ब्रह्मा निर्माता हैं, विष्णु पालनकर्ता हैं और शिव संहारक हैं। हालांकि, ब्रह्मा को देवताओं में सबसे वरिष्ठ माना जाता है। ब्रह्मा को धर्म का पिता माना जाता है, जिसका अर्थ है धार्मिकता। माना जाता है कि ब्रह्मा ने स्वयं को बनाया है और इसलिए, उन्हें स्वयं भू कहा जाता है, जिसका अर्थ है स्वयं प्रकट होने वाला। भगवान ब्रह्मा को पितामह, हिरण्यगर्भ और विश्वकर्मा के नाम से भी जाना जाता है। पितामह का अर्थ है पिताओं का पिता, हिरण्यगर्भ का अर्थ है सुनहरा भ्रूण और विश्वकर्मा का अर्थ है ब्रह्मांड का वास्तुकार। लेकिन इसके अतिरिक्त भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति की एक और कहानी भी है, जिसका संबंध भगवान विष्णु से हैं। आइए भगवान ब्रह्मा के प्रकट होने की कहानी जानें।


भगवान ब्रह्मा का जन्म कैसे हुआ

भगवान ब्रह्मा के जन्म से जुड़ी भगवत पुराण की कथा के अनुसार ब्रह्मा एक कमल के फूल भगवान विष्णु की नाभि से विकसित हुए थे। इस प्रकार उनका एक नाम नभिजा अर्थात नाभि से उत्पन्न होने वाला भी है। ब्रह्म पुराण की कथा के अनुसार ब्रह्मा का जन्म हिरण्यगर्भ नामक सोने के अंडे से हुआ था। इसलिए उन्हें हिरण्यगर्भ या स्वयंभू भी कहा जाता है। वहीं स्कंद पुराण में, देवी पार्वती को ब्रह्मांड की मां के रूप में बताया गया है। और बताया गया है कि ब्रह्मा, सहित अन्य सभी देवी देवताओं और तीनों लोकों का निर्माण माता शक्ति ने ही किया है।

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भगवान ब्रह्मा का रूप

अन्य हिंदू देवताओं की तरह ही भगवान ब्रह्मा का रूप भी अलौकिक है। भगवान ब्रह्मा के चार मुंह और चार हाथ हैं। उनका आसन अनंत सत्य को दर्शाता कमल हैं। ब्रह्मा के चार मुख चारों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की महत्वता को दर्शाते हैं। भगवान ब्रह्मा ने अपने चारों हाथों में से पहले हाथ में कमंडल धारण कर रखा है, जो संन्यास या त्याग का प्रतीक है। उन्होंने अपने दूसरे हाथ में वेदों को धारण कर रखा है। उनके तीसरे हाथ में माला है जिसका उपयोग जप और ध्यान के लिए किया जाता है। इसी के साथ उन्होंने अपने चौथे हाथ में कमल धारण कर रखा है जो प्रकृति और सृष्टि की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान ब्रह्मा का वाहन हंस है, जिसे सुंदरता और शांति का प्रतीक भी माना जाता है। ब्रह्म जो मुकुट पहनते हैं, वह सृष्टि के राजा के रूप में दुनिया पर उनके सर्वोच्च अधिकार को दर्शाता है।


ब्रह्मा कहां रहते हैं?

भगवान ब्रह्मा ब्रह्मलोक में रहते हैं। ब्रह्मलोक कई ब्रह्मांडों का समूह है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मलोक का एक दिन के पृथ्वी के चार अरब वर्षाें के बराबर है। ब्रह्मलोक के एक दिन को ब्रह्म कल्प कहा जाता है। अर्थात एक ब्रह्म कल्प चार अरब मानवीय वर्षों के बराबर है, जिसके अंत में पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो जाता है। इस प्रक्रिया को प्रलय कहा जाता है, जिसके बाद पुनः निर्माण और फिर एक ब्रह्मकल्प के बाद दुनिया का अंत। यह प्रक्रिया ब्रह्मलोक के 100 वर्षों तक दोहराई जाती है। अब आप सोच रहे होंगे कि ब्रह्मलोक के 100 वर्ष पूरे होने पर क्या होता है। तो आपको बता दें कि ब्रह्मलोक के 100 वर्ष ही भगवान ब्रह्मा की आयु भी मानी जाती है। ब्रह्मलोक के 100 वर्ष पूरे होने पर मौजूद ब्रह्मा स्वयं ही भस्म हो जाते हैं और फिर पुनः उनका पुनर्जन्म होता है। 18 महापुराणों में से एक लिंग पुराण, जो विभिन्न चक्रों की स्पष्ट गणनाओं को दर्शाता है, हमें बताता है कि ब्रह्मा का जीवन एक हजार चक्रों या महायुग में विभाजित है।


भगवान ब्रह्मा का आसन क्या है

कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति कमल के फूल से जुड़ी हुई है। इसीलिए भगवान ब्रह्मा का आसन कमल का फूल है। यदि हम प्रतिकात्मक रूप से ब्रह्मा के आसन कमल के फूल की व्याख्या करें तो यह दिव्य सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। उदाहरण के लिए, भगवान विष्णु को कमल नयन अर्थात कमल के समान आंखों वाला कहा जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार कमल के फूल की पंखुड़ियां आत्मा के विस्तार की सूचक हैं होने के साथ ही शरीर, वाणी और मन की पवित्रता का भी प्रतीक है। कमल के फूल पर बैठे ब्रह्मा का अर्थ है कि वह सभी प्रकार के लगाव और इच्छाओं से मुक्त है। जैसे कमल के फूल की पंखुड़ियां से पानी की बूंदें आसानी से सरक जाती हैं, वैसे ही क्रोध, काम और अन्य बुराइयां भगवान ब्रह्मा को परेशान नहीं करती हैं जो इन सभी बुराइयों से अलग रहते हैं।

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ब्रह्मा की पत्नी कौन है?

भगवान ब्रह्मा की दो पत्नियां हैं सरस्वती और गायत्री। पुराणों में वर्णित विवरण के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि के सृजन को आगे बढ़ाने के लिए अपने शरीर को दो भागों में विभाजित किया जिसमें एक नारी अंग ने सरस्वती का रूप धारण किया। चुंकि देवी सरस्वती ब्रह्मा के शरीर से निकली तो तार्किक रूप से वह ब्रह्मा की पुत्री हुई। लेकिन अपने आकर्षण के प्रति मजबूर ब्रह्मा आखिरकार सरस्वती को उससे शादी करने के लिए मनाने में सफल रहे। 

वहीं एक अन्य कथा के अनुसार एक बार की बात है, भगवान ब्रह्मा को एक यज्ञ करना था। उन्हें समारोहों को पूरा करने के लिए अपनी पत्नी की उपस्थिति की आवश्यकता थी। सरस्वती यज्ञ समारोह में पहुंचने में विफल रही। इसने ब्रह्मा को इतना क्रोधित किया कि उन्होंने पुजारी से कहा कि वह किसी भी महिला से उसका विवाह कर दें। उस समय आदिशक्ति ने गायत्री के रूप में अवतार लिया जिसका विवाह भगवान ब्रह्मा से हुआ। इन दोनों ही कथाओं का निष्कर्ष अंत में भगवान ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं की जाती तक पहुंचते हैं, इसलिए हम कम शब्दों में यह समझेंगे कि भगवान ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं की जाती है।


क्यों नहीं की जाती भगवान ब्रह्मा की पूजा

भगवान ब्रह्मा को विष्णु और षिव के समकक्ष की सम्मान प्राप्त है। लेकिन इसके बावजूद भी भगवान ब्रह्मा की घर में पूजा नहीं की जाती है। इसके पीछे का राज भगवान ब्रह्मा के विवाह की कहानी में ही छिपा है। एक कहानी के अनुसार जब भगवान ब्रह्मा देवी सरस्वती को विवाह के लिए मना रहे थे तब माता ने क्रोध में आकर ब्रह्मा को घरों में नहीं पूजे जाने का श्राप दिया। इसके अतिरिक्त एक अन्य कथा के मुताबिक जब ब्रह्मा ने माता गायत्री से विवाह किया तो माता सरस्वती ने उन्हे घरों में नहीं पूजे जाने का श्राप दिया था।


ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का निर्माण

सिद्ध पौराणिक और आम जनश्रुतियों में भगवान ब्रह्मा को ज्ञान का स्वमी और रचयता माना गया है। प्रासंगिक है कि भगवान ब्रह्मा ही उन सभी ज्ञान तत्वों के लिए जिम्मेदार है जो मनुष्यों और देवताओं को प्राप्त हैं। प्रारंभिक हिंदू लोककथाएं बताती हैं कि जब ब्रह्मा सांस छोड़ते हैं, तो ब्रह्मांड अस्तित्व में आता है। इसी के साथ जब वे अपनी सांसें वापस खींचते हैं तो ब्रह्मांड को समाप्त कर सभी मूल तत्वों को अपने अंदर समेट लेते हैं। कुछ मानवीय अवधारणाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा की दो सांसों के बीच करीब दो अरब मानवीय वर्षों का अंतराल होता है।


ब्रह्मा द्वारा देवताओं की नियुक्ति

वैदिक काल के कई उपनिषद और वेद ग्रंथ इस ओर इशारा करते हैं कि ब्रह्मा न सिर्फ निर्माण करते हैं बल्कि वे नीति निर्देशक भी हैं। इसका अर्थ यह है कि उन्होंने न सिर्फ देवताओं का निर्माण किया बल्कि उन्होंने देवताओं को अपनी अपनी जिम्मेदारियां भी सौंपी है। 


ब्रह्मा द्वारा जीव का निर्माण

सनातन धर्म भगवान ब्रह्मा को सृष्टि का निर्माता या रचयिता कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत में ब्रह्मा ने दस प्रजातियों का निर्माण किया, जिन्हें मानव जाति का पिता माना जाता है। हमें मनुस्मृति में इन इन प्रजातियों के नामों का भी उल्लेख मिलता है, उन्हें मरीचि, अत्रि, अंगिरसा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ, प्रचेत या दक्ष, भृगु और नारद के नाम से उल्लेखित किया गया है। 


ब्रह्मा द्वारा सप्तऋषियों की रचना

कहा जाता है कि ब्रह्मा ने ब्रह्मांड बनाने में मदद करने के लिए सात महान ऋषियों या सप्त ऋषियों को बनाया था। हालांकि सप्त ऋषि को भगवान ब्रह्मा का मानस पुत्र माना जाता है, क्योंकि वे भगवान के शरीर के बजाय भगवान ब्रह्मा के मन से पैदा हुए थे। यह मानस पुत्रों वाली कथा निस्संदेह यह दर्शाती है कि क्यों ब्रह्मा को सदैव ही मन और समझ से संबंधित माना जाता है। 


ब्रह्मा के मंदिर

उपरोक्त कथाओं के आधार पर यह तो स्पष्ट होता है कि माता सरस्वती के श्राप से ही भगवान ब्रह्मा की घरों में पूजा नहीं की जाती है। इसी के साथ आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि पूरे भारत में भगवान ब्रह्मा का सिर्फ एक ही मंदिर है जो राजस्थान के पुष्कर नामक शहर में स्थित है। इसके अलावा थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में भी भगवान ब्रह्मा का एक मंदिर मौजूद है। कुल मिलाकर पूरी सृष्टि में भगवान ब्रह्मा के सिर्फ दो ही मंदिर मौजूद है जहां ब्रह्मा की पूजा की जाती है।