सबसे भयावह श्राप (Curse), जो हिंदू पौराणिक कथाओं में दर्ज है…

“नजरअंदाज किया गया हर आशीर्वाद एक श्राप बन जाता है।” – पाउलो कोएल्हो

आजकल लोगों के मुंह में जो भी आता है, वे तुरंत बोल देते हैं। कई बार ये बातें फिल्टर की हुई होती हैं और कई बार बिना फिल्टर की हुईं। लेकिन हजारों साल पहले जब कोई भी ट्विटर या कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं हुआ करता था, जहां पर कि आप केवल एक क्लिक के साथ अपने विचारों को साझा कर सकते थे, तब कुछ भी बोलने से पहले लोग दो बार जरूर सोचते थे। वह इसलिए कि तब श्राप नाम की कोई चीज हुआ करती थी। यह वैसा ही है जैसे कि कोई नुकसान पहुंचा देने वाली बात सीधे दिल से निकाल कर बाहर कर देना। गुस्से में आकर लोगों को कोसना आजकल बहुत ही आम बात हो गई है, मगर जब हम हिंदू पौराणिक कथाओं के कुछ प्रसिद्ध श्रापों के बारे में बात करते हैं, तो कई अद्भुत कहानियां हमें पढ़ने के लिए मिल जाती हैं। ये कहानियां वास्तव में अविस्मरणीय बन गई हैं।


भृगु आचार्य का भगवान विष्णु को श्राप

मत्स्य पुराण में देवताओं और असुरों के बीच हुए कई युद्ध की पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए मिल जाती हैं। चाहे जो भी हो देवता हमेशा असुरों को परास्त करते रहते थे। असुरों के गुरु आचार्य शुक्र इससे बहुत ही परेशान थे। वे चाहते थे कि सभी देवों के देव भगवान शिव को किसी तरह से प्रसन्न किया जाए। जैसा कि हम सभी को मालूम है कि महादेव का अर्थ महाशक्ति है। असुरों को उन्हें अजेय बनाना था। इसलिए मृतसंजीवनी स्तोत्र या मंत्र पाने की इच्छा से उन्होंने ध्यान और तपस्या करना शुरू कर दिया। उन्होंने इसके लिए कठोर तपस्या की थी। इस बीच उन्हें असुरों की रक्षा भी करनी थी। यही वजह थी कि उन्होंने असुरों को कह दिया कि वे उनके पिता भृगु के आश्रम में जाकर शरण ले लें, ताकि वहां कोई उनका बाल बांका भी न कर सके।

देवताओं ने जब यह देखा कि असुरों ने भृगु आचार्य के आश्रम में शरण ले ली है, तो उन्होंने ठान लिया कि आचार्य शुक्र की अनुपस्थिति में असुरों को एक बार फिर से निशाना बनाने का यही सबसे उत्तम समय है। जब भृगु स्वयं आश्रम से कहीं दूर थे, तब असुरों ने उनकी पत्नी से मदद की गुहार लगाई थी। उनकी पत्नी ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया था और उन्होंने देवराज इंद्र को अदृश्य कर दिया था। देवराज इंद्र इससे परेशान हो गए थे और इससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु का आह्वान किया था। तब भगवान विष्णु ने देवराज इंद्र के अनुरोध को स्वीकारते हुए अपने सुदर्शन चक्र से आचार्य भृगु की पत्नी का सिर काटने का फैसला किया। उनके ऐसा करने के बाद जब ऋषि भृगु लौटे और उन्होंने यह देखा कि उनकी पत्नी के साथ क्या हुआ है, तो वे बड़े क्रोधित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि उन्हें धरती पर कई बार जन्म लेना पड़ेगा और सांसारिक जीवन की पीड़ा को भी भोगना पड़ेगा। जैसा कि हम सभी को मालूम है कि राम और कृष्ण जैसे भगवान विष्णु को अवतार लेने पड़े थे और जैसा कि ऋषि भृगु ने उन्हें श्राप दिया था, उसी तरीके से उन्हें सांसारिक कष्टों को भी यहां भुगतना पड़ा था।


जय और विजय के श्राप की कथा

भागवत पुराण में एक कथा का जिक्र मिलता है, जिसके मुताबिक जय और विजय बैकुंठ लोक के द्वारपाल थे। चार कुमारों को उन्होंने बैकुंठ की ओर आते हुए देखा। जय और विजय को इन चारों कुमारों की असली पहचान नहीं थी। ऐसे में उन्होंने इन चारों को बैकुंठ लोक में प्रवेश करने से रोक दिया। ये चारों कुमार भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। उन्हें प्रवेश करने से रोके जाने पर अत्यधिक क्रोध आ गया और उन्होंने दोनों ही द्वारपालों जय और विजय को बैकुंठ छोड़ने का श्राप दे दिया। इसकी वजह से जय और विजय दोनों बड़े ही भयभीत हो गए। वे तुरंत भगवान विष्णु की शरण में भागे-भागे पहुंचे और उनसे इस श्राप को वापस लेने की गुहार लगाई।

भगवान विष्णु को श्राप का सम्मान करना था। इसकी अवहेलना वे नहीं कर सकते थे। यही वजह रही कि उन्होंने जय और विजय को दो विकल्प दिए और दोनों में से एक का चयन करने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने दोनों से कहा कि या तो वे सात जन्म लेकर भगवान विष्णु के भक्त बनें या फिर तीन जन्मों में वे भगवान विष्णु के शत्रु के रूप में पैदा हों। जय और विजय सात जन्म तक भगवान विष्णु से अलग रहने में खुद को असमर्थ पा रहे थे। ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि वे तीन जन्मों में भगवान विष्णु के दुश्मन के रूप में जन्म लेंगे। इस तरह से जय और विजय ने बाद में तीन जन्मों में हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष, रावण और कुंभकर्ण एवं दंतवक्र और शिशुपाल के रूप में जन्म लिया। बाकी चीजें इसके बाद इतिहास ही हैं, जिनके बारे में आपने जरूर पढ़ा होगा।


ऋषि भृगु का भगवान शिव को श्राप

ऋषि भृगु ने एक बार यह फैसला किया कि वे त्रिदेव (भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव) से मिलने के लिए जाएंगे और पूरे ब्रह्मांड में यह घोषणा करेंगे कि त्रिदेव में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं। यह सोच कर ऋषि भृगु सबसे पहले भगवान ब्रह्मा के पास ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि भगवान ब्रह्मा सृष्टि की रचना में काफी व्यस्त चल रहे हैं।

ऋषि भृगु को लगा कि अभी उन्हें टोकना उचित नहीं होगा। वे बाद में दोबारा वहां आ जाएंगे। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव और देवी पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत के लिए उड़ान भर दी। जब वे कैलाश पहुंचे, तो वहां पर नंदी ने उन्हें प्रवेश द्वार पर रोक दिया। नंदी ने ऋषि भृगु से यह कहा कि उन्हें अभी अंदर जाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि भगवान शिव और माता पार्वती इस वक्त एक निजी कक्ष में हैं। नंदी ने भले ही ऋषि से उन्हें अंदर नहीं जाने देने के लिए माफी भी मांगी, मगर तब तक ऋषि बड़े ही क्रोधित हो चुके थे।

ऋषि भृगु ने उसी क्षण भगवान शिव को यह श्राप दे दिया कि अपनी सुंदरता की वजह से जो वे अपने निजी जीवन में बड़े ही व्यस्त चल रहे हैं, अब उन्हें लोग पाषाण यानी कि पत्थर के रूप में पूजेंगे। इसी का नतीजा है कि उस समय से भगवान शिव की पूजा लिंग या पत्थर के रूप में होती आ रही है।


महर्षि गौतम का इंद्र और अहिल्या को श्राप

हमें इस बात का यकीन है कि हिंदू पौराणिक कथाओं में श्राप की सूची में यह सबसे अनसुनी कहानियों में से एक है। अहिल्या भगवान ब्रह्मा की बेटी थीं और वास्तव में वे दुनिया की सबसे खूबसूरत नारी थीं। उनका विवाह महर्षि गौतम से हुआ था। एक बार ऋषि गौतम घर में नहीं थे। वे कहीं बाहर गए हुए थे। इसी दौरान देवराज इंद्र ने महर्षि गौतम का रूप धारण कर लिया और ऋषि होने का नाटक करते हुए उनकी कुटिया में प्रवेश कर गए। अफसोस की बात यह भी रही कि अहिल्या भी इंद्र की चाल को समझ नहीं सकीं और देवराज इंद्र के साथ उन्होंने अपनी शुद्धता खो दी। बाद में जब ऋषि गौतम लौटे और उन्होंने इंद्र को अपने भेष में देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए।

आवेश में आकर ऋषि गौतम ने भगवान विष्णु को उनके शरीर पर एक हजार योनि होने का श्राप दे दिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि देवराज इंद्र को उन्होंने नारियों के शरीर के प्रति बेहद जुनूनी पाया था। इसके बाद देवराज इंद्र ऋषि गौतम से जब दया की भीख मांगने लगे, तो उन्होंने अपने श्राप को बदल दिया और उन योनियों को इंद्र की आंखों में बदल दिया। ऋषि गौतम यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपनी पत्नी अहिल्या को भी श्राप दे दिया था। उन्होंने पहले अहिल्या को पत्थर बना दिया। जब तक कि भगवान राम ने अहिल्या को नहीं छुआ और उन्हें फिर से शुद्ध नहीं किया, तब तक वे पत्थर के रूप में ही रही थीं। हिंदू पौराणिक कथाओं में श्राप की यह एक बड़ी ही नाटकीय कहानी है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?


युधिष्ठिर का सभी नारियों को श्राप

हिंदू पौराणिक कथाओं में श्राप के बारे में क्या एक आप एक छोटी सी कहानी सुनने के इच्छुक हैं? तो चलिए आपको ऐसी ही एक कहानी बताते हैं। जब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध खत्म हो गया, तो पांडवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर अपने परिवार के खोए हुए सभी सदस्यों एवं प्रियजनों के लिए अंतिम संस्कार की रस्म अदा कर रहे थे। इसी दौरान जब वे कर्ण के लिए कर्मकांड कर रहे थे तो वे बहुत ही व्यग्र थे कि उनकी मां ने इतने वर्षों तक उनसे उनके बड़े भाई कर्ण के बारे में सच्चाई छुपा कर रखी थी। दरअसल, उनकी मां कुंती ने कर्ण की मौत के बाद यह बताया था कि कर्ण उन सभी का सबसे बड़ा भाई था। साथ ही कुंती ने भगवान सूर्य के आशीर्वाद से पैदा हुए कर्ण के जन्म की सारी कहानी युधिष्ठिर समेत सभी पांडवों को बता दी थी। युधिष्ठिर ने कर्ण का कर्मकांड करते हुए अपने आंसू पोछे और इस दौरान सभी नारियों को यह श्राप दे दिया कि वे किसी भी रहस्य को अपने तक सीमित नहीं रख पाएंगी। यही वजह है कि ऐसा कहा जाता है कि महिलाओं के पेट में कोई भी बात नहीं पचती।


परशुराम का श्राप

हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक कर्ण कुंती का परित्याग किया हुआ पुत्र था। कर्ण की जीवन की शुरुआत की वास्तविकता क्या थी, इसके बारे में प्रारंभ में सूर्य को भी जानकारी नहीं थी। एक दिन कर्ण परशुराम के पास अध्ययन करने के लिए पहुंचा और वहां उसने उन्हें झूठ कह दिया कि वह ब्राह्मण है, जबकि कर्ण असल में क्षत्रिय था। कर्ण यह जानता था कि यदि वह क्षत्रिय के रूप में परशुराम के पास सीखने के लिए जाता है, तो परशुराम उसे कभी भी शिक्षा नहीं देंगे, क्योंकि परशुराम केवल ब्रह्मणों को ही शिक्षा देते थे। फिर एक दिन भगवान परशुराम कर्ण की गोद में अपना सिर रखकर सो रहे थे। इसी दौरान एक बिच्छू ने कर्ण को काट लिया।

बिच्छू के काटने की वजह से कर्ण को बहुत दर्द हो रहा था और खून का रिसाव भी होने लगा था। इसके बाद भी कर्ण जरा भी विचलित नहीं हुआ, क्योंकि वह चाह रहा था कि उसके गुरु की नींद में बाधा नहीं पड़े। जब परशुराम उठे और उन्होंने यह देखा तो वे समझ गए कि इतना दर्द तो केवल एक क्षत्रिय ही सहन कर सकता है। ऐसे में उन्होंने झूठ बोलने के लिए कर्ण को श्राप दे दिया कि वे उस वक्त ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करने का तरीका भूल जाएंगे, जब उन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत होगी। इसका परिणाम यह हुआ कि महाभारत के महायुद्ध में कर्ण की पराजय हुई और वह वीरगति को प्राप्त हुआ।


निष्कर्ष

क्या आपको नहीं लगता कि ये श्राप बहुत ही डरावने थे? चलिए ठीक है, आपको डरने की जरूरत नहीं है। फिर भी हम यह उम्मीद करते हैं कि आप हिंदू पौराणिक कथाओं के श्राप के स्तर को तो समझ ही गए होंगे। वाकई यह बड़ा ही भयानक था। दर्द, क्रोध और हताशा की वजह से सोचिए क्या-क्या हो सकता है।

तो हम आपको हिंदू पौराणिक कथाओं के प्रसिद्ध श्रापों के बारे में बता चुके हैं। आज के लिए बहुत से श्राप हो गए। अब मुस्कान और शांति फैलाने का वक्त है।