शिव और शंकर के बीच के अंतर को समझें

बड़े होने के दौरान हम सभी ने भगवान शिव के बारे में एक संहारक के रूप में और उनके कई चमत्कारों के बारे में भी कई किस्से सुने हैं। इनकी सूची का कोई अंत नहीं है। हम उनकी पूजा उनके लिंग रूप में या फिर मानव शरीर के रूप में करते हैं। फिर भी भगवान शिव को ज्यादातर चित्र में ध्यान करते हुए दिखाया गया है। ऐसी में वास्तव में दोनों के बीच बड़ा अंतर है।

हमारे माता-पिता ने हमें यह बताया है कि दोनों एक ही हैं, लेकिन वास्तव में वे एक जैसे हैं नहीं। तो क्या उन्होंने हमसे झूठ बोला था? हमारे निर्दोष मन को जो सवालों का मंथन चल रहा था, उससे वे बचना चाह रहे थे? खैर जो भी हो, पर हम वास्तविकता की अपनी खोज पर वापस आते हैं। निराकार का लिंग दरअसल शिव है, जबकि देवदूत देवता शंकर कहे जाते हैं। इनमें कितनी विभिन्नता है और दोनों कितने संबंधित हैं, यह जानने के लिए हम आपको एक यात्रा पर ले जाने के लिए तैयार हैं। लेकिन थोड़ा रुकिए। इतनी जल्दी भी क्या है? सबसे पहले हम आपको दोनों रूपों के पीछे का अर्थ बताने जा रहे हैं।


निराकार शिव

शिवलिंग तो आपने देखा ही होगा। आपने किसी वजह से इसकी पूजा भी की होगी। मगर क्या आपने कभी इसे समझने का प्रयास किया है? जिस अंडाकार शिवलिंग की हम पूजा करते हैं, उसका बड़ा ही गहरा अर्थ है। निश्चित रूप से शिव सर्वोच्च आत्मा, परमात्मा हैं। इस ब्रह्मांड की शुरूआत भगवान शिव की वजह से ही हुई है। भगवान शिव के कारण ही इसका अस्तित्व है। अंडाकार आकार ईश्वर की निराकारता के बारे में बताता है। यहां देवता के अन्य देवताओं के साथ भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। यह वास्तव में उर्जा ही है।

लिंग के रूप में जो भगवान शिव का चित्रण किया गया है, यह इनके निराकार स्वरूप को दर्शाता है। एक त्रिपुंड सामान्यतः एक शिवलिंग के रूप में मौजूद होता है। इस शब्द त्रिपुंड से हम परिचित नहीं हैं। यहां हम आपका मार्गदर्शन कर रहे हैं। त्रिपुंड शिव त्रिनेत्र, त्रिलोकनाथ और त्रिकालदर्शी की तीन विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। अन्य शब्दों में कहें तो यह त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। छोटी सी जो लाल बिंदी है, वे शिव हैं, जो सभी में रहते हैं। इसलिए लिंग इन सभी रूपों की याद दिलाता है।


शंकर, एक देवता

शंकर एक बहुत ही खास मानवीय स्वरूप हैं। ब्रह्मांड में सबसे सुंदर भौतिक रूप इन्हीं का माना गया है। वास्तव में यह होना भी चाहिए। आखिरकार यह शंकर के बारे में जो है। शंकर अपनी पत्नी पार्वती के साथ पृथ्वी पर (कैलाश में) निवास करते हैं। लंबे बालों और जटाओं के रूप में उनका चित्रण किया गया है। यह दिखाता है कि वे तपस्वी हैं। उनके गले में एक बड़ा सा सांप लिपटा हुआ नजर आता है। यह भय पर शंकर के स्वामित्व अथवा उनके प्रभुत्व का बोध कराता है। उनके बगल में जो त्रिशूल रखा गया है, तीनों लोकों पर यह उनकी शक्ति का प्रतीक है। आमतौर पर शंकर जानवरों की खाल पहनते हैं, जिससे एक बार फिर से उनकी तपस्या की याद आती है।

ऐसा कहा जाता है कि उनके उलझे हुए बाल या जटाएं बड़े अर्धचंद्राकार चंद्रमा की जो स्थिति है, वह श्राप के देवता चंद्रमा को ठीक कर देता है। वहीं, उनके पास जो डमरु मौजूद है, वह ब्रह्मांड के अद्वैत सार का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान शंकर के गीत या भजन तैयार करते वक्त कई भारतीय रैपर्स द्वारा डमरु का इस्तेमाल किया जाता है। पवित्र गंगा को भी इन्होंने अपने सिर में बांध रखा है। दुनिया को बचाने के लिए उन्होंने जो जहर यानी कि बिष पी लिया था, उसकी वजह से उनका गला नीला नजर आता है। फिर भी जो चीज सबसे अलग नजर आती है, वह है उनकी तीसरी आंख। यह चिरस्थाई ज्ञान और अत्यधिक जागरूकता का प्रतिनिधित्व करती हैं। शंकर की सबसे लोकप्रिय विशेषताओं के बारे में जब हम बात करते हैं तो हम आपको यह स्पष्ट कर दें कि शंकर न केवल ब्रह्मांड के, बल्कि मानवों के सभी पापों एवं अशुद्धियों का भी संहार करने वाले हैं।


शंकर बनाम शिव

हमने शिव और शंकर के बीच के अंतर के बारे में तो बता दिया है। अब हम आपको अन्य तुलनाओं के बारे में भी बताते हैं। जैसा कि हम सभी को मालूम है कि शिव संहारक हैं। लिंग पुराण के मुताबिक इस खास शिवलिंग में किसी चीज को बनाने के साथ उसे नष्ट करने या फिर से उसका निर्माण करने की दिव्य ताकत मौजूद है। सर्वोच्च आत्मा की वजह से ही हम सभी का अस्तित्व है। साथ ही दूसरी ओर शंकर संहारक हैं। जैसा कि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है कि वे न केवल पुरानी व्यवस्था को नष्ट कर देते हैं, बल्कि वे दुनिया से अशुद्धियों और अंधकार का भी नाश करते हैं। वास्तव में शंकर के नाम की परिभाषा का शाब्दिक अर्थ देखें तो यह संदेह (शंका) का संहारक (हर) होता है। उनके कई नामों में से एक हर – विनाशक भी है।

शिव और शंकर के बीच के अंतर को हम अब भी पूरी तरीके से स्पष्ट नहीं कर पाए हैंम निराकार शिव पूरी तरीके से सर्वव्यापी हैं। शिव की कोई पहचान नहीं है। वे अमूर्त हैं। पूरी दुनिया इसमें सम्मिलित है। शिव के लिए कोई अच्छा या बुरा, मित्र या शत्रु, ईमानदार या झूठा जैसी कोई भी चीज नहीं है। यह अजीब जरूर है, मगर सच भी यही है। सब कुछ उनसे ही शुरू हुआ है और अंत भी उन्हीं से है। शंकर आमतौर पर अंत के लिए जिम्मेदार होते हैं। सब कुछ उनके साथ विलीन हो जाने वाला होता है। उनके कई नाम हैं और इनके जटिल पहलू भी हैं। उनके लिए किसी के अंदर मौजूद बुराई को नष्ट कर देना अनिवार्य है।

शिव और शंकर के बीच के अंतर की यह एक सामान्य समझ है। शिव और शंकर के बारे में अपने तरीके से और भी बहुत सी चीजें मौजूद हैं। आसान शब्दों में कहें तो अब तक हमने बहुत ही थोड़ी सी चीजों के बारे में जाना है। उनके बारे में सारी चीजें जानना लगभग नामुमकिन है। यदि कोई यह सब एक ही जीवन में जान सकता है, तो निश्चित रूप से वह एक प्रबुद्ध आत्मा ही होगा।


शंकर = शिव - एक जैसे कैसे संबद्ध हैं दोनों?

जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि हम हमेशा शिव और शंकर को पर्यायवाची रूप में ही इस्तेमाल में लाते हैं। हालांकि लोगों को इन दोनों के बीच के सूक्ष्म अंतरों के बारे में शायद ही मालूम होगा। हम उन्हें एक मानकर जो उनकी पूजा करते हैं, वास्तव में यह पूरी तरीके से गलत नहीं है। ऐसा इसलिए कि इस अंतर के बारे में नहीं जानना हमारी कम जागरूकता की वजह से है। वास्तव में यह एक तरह का अज्ञान है। चलिए अब हम असमानता पर लौटते हैं। सृष्टि की जो कई कहानियां प्रचलित हैं, उनमें ब्रह्मा और विष्णु के मूल्य का उल्लेख शाश्वत निराकार शिव से है।

एक रचना से जुड़ी हुई कथा यह बताती है कि शिव, ब्रह्मा और विष्णु के समक्ष एक विशाल लिंग के रूप में प्रकट हुए थे, जिसका कोई अंत ही नहीं था और न ही इसकी कोई शुरुआत थी। ऊर्जा के इसी शाश्वत स्तंभ ने ब्रह्मा को सृष्टि में जीवन को स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा था और इसके बारे में हम जानते भी हैं। ब्रह्मा ने ही मनुष्य का सृजन किया था। ब्रह्मा अपने डिजाइन से खुश तो बहुत ही थे, लेकिन वे यह महसूस कर रहे थे कि कुछ तो कमी रह गई है। प्रजनन का कोई साधन ही इसमें मौजूद नहीं है। ऐसे में उन्होंने भगवान शिव से मदद की कामना की थी।

अब दिलचस्प बात यह है कि शिव उनके सामने अर्धनारीश्वर यानी कि आधे पुरुष और आधी महिला के रूप में प्रकट हुए थे। ब्रह्मा इस पर मोहित हो गए और उन्होंने शिव से उनके रूप के पीछे का अर्थ पूछा। शिव ने ब्रह्मा को समझाना शुरू किया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मांड में स्त्री शक्तियों यानी कि शक्ति के अस्तित्व के बिना सब कुछ गायब ही रहेगा। शक्ति ही वह ताकत है, जो उसे बनाती है। इस तरह से यह बातचीत खत्म हुई।

जब ब्रह्मा ने शक्ति की श्रेष्ठता के बारे में सुना, तो उन्होंने शक्ति से उनकी मदद करने के लिए कहा। भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी, ब्रह्मा की पत्नी सरस्वती शिव शक्ति के रूप में बड़ी ही दर्दनाक अलगाव के रूप में प्रकट हुईं। इसके बाद शक्ति ब्रह्मांड की सुंदरता बन गई। यह प्रकृति के नाम से जानी गई। इसी से दुनिया में स्त्री का पक्ष उभर कर आया। हालांकि, ऐसा करने के दौरान अपने दूसरे आधे हिस्से को उन्होंने अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया था। ऐसा कहा जाता है कि शिव के इस शेष आधे स्वरूप ने दुनिया की सारी सुंदरता से अपनी आंखें मूंद ली थी और एक अलग ऋषि की तरह वे रहने लगे थे। हालांकि, उन्होंने बहुत ही बुद्धिमता को साझा किया था।

पृथ्वी पर जिस दिन शिव अपने मानव रूप में प्रकट हुए थे, उस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन उत्सव मनाया जाता है। ढोल-नगाड़े बजते हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि वर्षों से भगवान शिव ने शंकर के श्रृंगार वाले विचित्र पहलुओं को अपना रखा है। वैसे, यह जाहिर है कि शिव के बिना ब्रह्मांड कार्य नहीं करने वाला। 0.01 प्रतिशत भी नहीं। इसलिए सभी देवता शंकर और पार्वती के मिलन तक बड़ी ही अजीब स्थिति में थे। आखिरकार सौभाग्य से महाशिवरात्रि के दिन दोनों ने शादी का निर्णय कर लिया। इसी दिन से इन सभी चीजों की शुरुआत हुई।


शिव और शंकर के बीच का अंतर - निष्कर्ष

शिव और शंकर के बीच का अंतर जानने की यह यात्रा वाकई बड़ी रोमांचक रही है। आप इससे सहमत हैं या नहीं? आखिरकार यह देवों के देव महादेव के बारे में है। अब तक हमने शिव और शंकर के बीच के अंतर के बारे में बताया है। अब लोगों को भगवान शिव के बारे में जागरूक बनाना और इस बारे में स्पष्टता फैलाना आपकी जिम्मेवारी है। आप मानें या ना मानें शिव की मान्यता के बारे में बखान करना सैकड़ों किताबों के लिए भी संभव नहीं है। जी हां, यह बात हम पूरी गंभीरता से कह रहे हैं। शिव और शंकर के बीच के अंतर के बारे में लिखना वास्तव में एक विशाल महासागर के पानी की सिर्फ एक बूंद के बराबर है। तो चलिए इस ब्लॉग को हम कुछ सबसे खूबसूरत और प्रभावी शब्दों के साथ समाप्त करते हैं: सत्यम… शिवम… सुंदरम।



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