घर (Residence) के लिए वास्तु की कंप्लीट गाइड बुक (Guidebook)

वास्तु शास्त्र सूर्य, चंद्रमा, प्रकाश जैसे विभिन्न प्रकार की ऊर्जा से संबंधित होता है। ऐसे में एक भवन निर्माण के समय लोगों को विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी विभिन्न प्रकार की समस्याओं या बाधाओं को पार करने के लिए हमें चाहिए कि हम वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करें। एक घर में वास्तु के नियमों की पालना करने से घर का हर हिस्सा सही ऊर्जा और आकर्षण पैदा करता है। इसमें फिर चाहे वह लिविंग रूम हो या किचन, टॉयलेट, पूजा कक्ष, उद्यान क्षेत्र, निजी भूखंड, टैंक, बोरवेल, भंडारण स्थान समेत सभी जगहों का निर्माण तय जगह पर होना चाहिए। जब भी बात सीढ़ियों, बालकनी या पूल की होती है, तो वास्तु के नियमों का बड़ी बारीकी से ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसे में वास्तु शास्त्र के नियमों का महत्व निजी जीवन में भी बहुत अधिक होता है। यह एक व्यक्ति को कई लाभ हासिल करने में सीधे तौर पर मदद कर सकता है।


रिहायशी भूखंडों के लिए वास्तु शा की किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

अगर आप वास्तु के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं यकीन मानिए कि आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा और अच्छी तरंगों का संचार होगा। यह एक परिवार के लिए अद्वितीय ऊर्जा ला सकता है, सही दिशा में विकास हो सकता है और परिवार सुख समृद्धि के साथ आगे बढ़ सकता है। एक घर से जुड़े वास्तु के नियमों में कई बातों का असर देखने को मिलता है, यह घर, एक कमरे या किसी खास स्थान का भी हो सकता है और उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण-पूर्व और उत्तर-पश्चिम में किए जाने वाले निर्माण का भी हो सकता है, हर निर्माण जो घर में किया जा रहा है, उस पर वास्तु के नियमों का प्रभाव रहेगा।

वास्तु शास्त्र को मानने वाले लोगों की यह धारणा होती है कि अगर कोई घर वास्तु शास्त्र के नियमों के मुताबिक बनाया जाता है, तो वह घर में रहने वालों के लिए शुभ होता है। इसके विपरीत अगर कोई घर वास्तु के नियम अनदेखा करके बनाया जाता है तो यह घर में रहने वालों के लिए न केवल परेशानी का सबब बनता है बल्कि उनके जीवन को भी खतरे में डाल सकता है। ऐसा करना जीवन के कई तरह के संघर्ष पैदा कर देता है। आपसी विवादों का जन्म दे सकता है। लोगों का मानना अगर घर में सुख शांति बनी रखना चाहते हैं तो गलत निर्माण में सुधार करवाना, उसका पुनर्निर्माण करवाना या उसे वास्तु के नियमों के मुताबिक सही करवाना चाहिए। ऐसा करने से कष्ट कम हो जाते हैं, बाधाएं जीवन से दूर होती है।


वास्तु की आधारभूत प्रक्रिया

हमारे विशेषज्ञों का आपके घर के विभिन्न क्षेत्रों के लिए वास्तु दिशा निर्देशों के बारे में क्या कहना है, आइए जानते हैं?

दरवाजे और खिड़कियों के लिए वास्तु:
सबसे पहले आपके घर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। प्रवेश मार्ग और खिड़कियों की स्थिति उत्तर-पूर्व, उत्तर-पूर्व के पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर होनी चाहिए। यह स्थिति सकारात्मक ऊर्जा को कमरे में प्रवेश करने की अनुमति देती है। प्रवेश द्वार के पास कोई भी शुभ चिन्ह सजावट के तौर पर लगाया जा सकता है।

घर में दो रास्ते होने चाहिए। एक रास्ते का प्रयोग प्रवेश के लिए होना चाहिए तो दूसरे रास्ते का इस्तेमाल निकास के मार्ग के तौर पर किया जाना चाहिए। अगर ऐसी संभावनाएं हों तो इसका इस्तेमाल जरूर किया जाना चाहिए। निकास वाले रास्तों को सहज और सुंदर होना चाहिए। इस दरवाजे को एक पलड़े का बनाया जाना चाहिए।

घर के लिए मौलिक रूप से बनाए जाने वाले प्रवेश द्वार के लिए कुछ खास बातें हैं, प्रवेश द्वार दो पलड़े का होना चाहिए। यह सागवान की लकड़ी या कठोर धातु का बनाया जाना चाहिए। ऐसा मजबूती की लिहाज से किया जाना चाहिए।

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लिविंग रूम के लिए वास्तु:
लाउंज किसी भी परिवार में एक प्रमुख स्थान माना जाता है। यह स्थान किसी भी घर में सबसे आगे होता है, यह सबके लिए खुला रहता है, यहां पर आम तौर पर लोग आते जाते रहते हैं। वे काफी चौड़े या छोटे हो सकते हैं। ड्राइंग रूम के लिए वास्तु के नियम कहते हैं कि इसका सबसे अधिक ध्यान रखा जाना चाहिए, सही जगह पर बनाया जाना चाहिए। घर बनाते समय इसके गलत दिशा में होने के कारण परिवार पर पडऩे वाले प्रभावों को याद रखना चाहिए। इसे पूर्व दिशा में बनाने से अच्छे परिणाम मिलते हैं, वहीं उत्तर दिशा में बनाए जाए तो लिविंग रूम बीच में बनाने की बजाय आगे की तरफ बनाया जाना चाहिए।

लिविंग रूप के लिए वास्तु के टिप्स बताते हैं कि इस जगह को रिसीविंग एरिया से पश्चिम या दक्षिण दिशा में बनाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से यह सही ऊर्जा व तरंगों को ग्रहण नहीं कर पाता है।

लिविंग रूम के लिए एक से अधिक प्रवेश द्वार हो सकते हैं, बस यह ध्यान रखने की जरूरत है कि वे कमरे वास्तु के नियमों के मुताबिक बने हुए हों। इसके अलावा इस कमरे को भव्य, सुंदर और आकर्षक बनाना चाहिए, ऐसा करने से जीवन में आनंद और समृद्धि को बढ़ाता है। जीवन में कठिनाइयों को दूर करता है।

शयन कक्ष के लिए वास्तु
वास्तु के अनुसार शयन कक्ष दक्षिण पूर्व दिशा में होना चाहिए। चूंकि यह कक्ष दक्षिण या दक्षिण-पूर्व में होता है तो याद रखिए कि इसमें खिड़कियां भी सही और आइडियल तौर पर होनी चाहिए। ऐसा करना जीवन में भरपूर आनंद लाता है।

विवाहित जोड़ों का बेडरूम या शयन कक्ष दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक आदर्श स्थान पर होना चाहिए। इसके साथ ही अगर घर में कई लोग रहते हैं तो मुख्य शयनकक्ष ऊपरी मंजिल पर होना चाहिए। ध्यान रखें कि किसी भी स्थिति में, बच्चों का कमरा समान क्षेत्र में नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे असुविधा होती है। ऐसा नहीं होने पर विवाहित जोड़े के लिए कई तरह की परेशानी पैदा हो सकती है।

बच्चों के कमरे के लिए वास्तु
वास्तु-शास्त्र में बच्चों के कमरे को कैसे बेहतर बनाया जाए और कैसे रखा जाए, यह बात थोड़ी पेचीदा है। बच्चों का कमरा एक घर के पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में हो सकता है। बिस्तर कमरे के दक्षिण, पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम में होना चाहिए। उनके सिर पूर्व की ओर इशारा करते हुए रहना चाहिए जबकि उनके पैर पश्चिम की ओर होने चाङिए। दरअसल,अंतर्दृष्टि और स्मृति के लिए अच्छी माने जाने वाली ऊर्जा इसी दिशा में होकर प्रवाहित होती है।

आवासीय फ्लैटों के लिए रेस्ट रूम का वास्तु:
रेस्ट रूम के बारे में वास्तु कहता है कि रेस्ट रूम में वॉशरूम के लिए पश्चिम और दक्षिण दिशा सबसे सही होती हैं। कचरे के लिए जगह उत्तर-पूर्व दिशा में होनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि सूरज की रोशनी सीधे तौर पर कमरे में आती हैं। वॉशरूम पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में होना चाहिए और 30 सेमी से 60 सेमी की डिग्री पर होना चाहिए।

भवन का शौचालय पश्चिम या उत्तर-पश्चिम कोने में स्थित होना चाहिए। इसके साथ ही बाथटब और सिंक वॉशरूम के उत्तर-पूर्व, उत्तर या पूर्व दिशा में होने चाहिए।

लिविंग रूम के लिए वास्तु:
लाउंज एरिया रसोई के नजदीक होना चाहिए। यह दक्षिण-पश्चिम, उत्तर-पश्चिम या पूर्व दिशा के पास होना चाहिए। लाउंज एरिया पश्चिमी कोने में हो सकता है। अगर रसोई दक्षिण पश्चिम में हो, तो यह रसोई से दूर होना चाहिए। ऐसा किया जाना आर्थिक विकास में बाधक बन सकता है। यह मालिक का कल्याण नहीं होने देता है। इसके साथ ही खाने की मेज को अपने घर के दक्षिण-पश्चिम कोने में नहीं बल्कि बीच में रखना चाहिए।

रसोई और लाउंज एरिया अलग अलग मंजिल पर नहीं होना चाहिए। ऐसा करना कई परेशानियों का सबब बन जाता है। मसलन एक मंजिल पर खाना बनाना और दूसरी मंजिल पर खाना खिलाना, यह बहुत मुश्किल प्रतीत होता है, खाने वाले के लिए भी और परोसने वाले के लिए भी।

रसोई के लिए वास्तु :
वास्तु शास्त्र के मुताबिक रसोई दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में होनी चाहिए। खाना बनाने की दिशा पूर्व में होनी चाहिए। घर के उत्तर-पूर्वी हिस्से को रसोई के रूप में उपयोग करने से बचें क्योंकि यह नकारात्मक वाइब्स लाता है और परिवार के बीच झगड़ा पैदा करता है।

धुलाई क्षेत्र की व्यवस्था उत्तर-पूर्व दिशा की ओर और ओवन से दूर होनी चाहिए। ऐसा करने से परिवार के अंदर सद्भाव और प्रेम बना रहता है।

रसोई घर के उत्तर-पूर्वी कोने में नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे परिवार के सदस्यों में परेशानी बनी रहती है। भंडारण या सामान रखने की रैक दक्षिण या पश्चिम की ओर होना चाहिए।

पूजा कक्ष के लिए वास्तु:
यह शायद एक घर में सभी का सबसे महत्वपूर्ण और सकारात्मकता लाने वाले कमरों में से एक है। घर के वास्तु के अनुसार यह भूतल के उत्तर-पूर्वी कोने में नहीं होना चाहिए। इसे पूर्व, दक्षिण या पश्चिम दिशा में बनाने के बारे में विचार किया जा सकता है।

भगवान के चित्र या प्रतीकों को पूर्व या पश्चिम में रखना चाहिए, जबकि पूजा करने वाले का मुंह पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए। पूजा का मंदिर या घर डिवाइडर से 2.5 सेमी तक रहना चाहिए।

भगवान को प्रार्थना करने समय दिशा कोई भी हो सकता है, याचक की दिशा के बारे में कोई खास बात स्पष्ट नहीं है। भगवान के प्रति प्रतिबद्धता दिशा देखकर नहीं की जाती है, यही कारण है कि हर दिशा में की गई याचना स्वीकार होती है।

अध्ययन कक्ष के लिए वास्तु:
पढ़ाई के कमरे यानी अध्ययन कक्ष, स्टडी रूम को लेकर वास्तु के अपने नियम है। वास्तु बताता है कि अगर पढ़ाई में एकाग्रता लानी है तो यह स्थान शांतिपूर्ण होना चाहिए। इसे उत्तर पूर्व दिशा में होना चाहिए। इसे पूजा कक्ष या प्रार्थना कक्ष के पास बना सकते हैं। यह कमरे को एक बेहतर स्थिति में लाता है। इसी तरह अध्ययन का कमरा पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए।

पुस्तकालय को भी पश्चिम दिशा में बनाया जाना चाहिए, इसे कभी भी कोने में नहीं बनाना चाङिए। इसमें अलमारियां उत्तर, ऊपरी पूर्व या पश्चिम में होनी चाहिए, न कि पूर्व, उत्तर या पश्चिम में होनी चाहिए।

वास्तु के मुताबिक इस कमरे में दो द्वार होने चाहिए। इस कमरे के उत्तर, उत्तर-पूर्व या पश्चिम में दो द्वार बनाए जाने चाहिए वहीं खिड़कियां कमरे के पूर्व, उत्तर या पश्चिम में होनी चाहिए।

स्विमिंग पूल के लिए वास्तु:

स्वीमिंग पूल, भूमिगत पानी की टंकी, कुएं या बोरवेल घर के पूर्व या उत्तर-पूर्वी हिस्से में होना चाहिए।
पानी धन की निरंतर प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है। बैंक में हमारे धन की स्थिति को बताता है। जब भी ऐसा कोई निर्माण करें तो निर्माण उत्तर-पूर्व दिशा से शुरू होनी चाहिए और पूर्व दिशा में जाकर खत्म होना चाहिए। इसी तरह उत्तर पूर्व से निर्माण शुरू करने और उत्तर दिशा में जाकर काम खत्म करने का लाभ परिवार को मिलता है।

पूल का झुकाव पश्चिम या पूर्व की ओर से होना चाहिए। यदि पूल उत्तरी दिशा में स्थित है, तो झुकाव दक्षिण में शुरू होना चाहिए और उत्तर में समाप्त होना चाहिए।

पानी की टंकी के लिए वास्तु:
वास्तु शास्त्र के अनुसार पानी की टंकी को दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखा जाना चाहिए क्योंकि यह पानी के भराव के लिहाज से सबसे बेहतर क्षेत्र माना जाता है। किसी भी घर के पश्चिमी कोने पर भी ओवरहेड पानी की टंकी लगाई जा कसती है। जैसा भी हो, लेकिन इस पानी की टंकी को कभी भी छत के भीतर नहीं बनाना चाहिए। ऐसा करना शुभ नहीं होता है।

घरेलू पानी की टंकियों के लिए वास्तु शास्त्र के नियम कहते हैं कि ओवरहेड पानी की टंकी उत्तर-पश्चिम में हो सकती है। अगर टैंक छोटा हो तो छत से लगभग एक मीटर दूर होना चाहिए।

वास्तु शास्त्र के मुताबिक पानी की टंकियों को छत से थोड़ा ऊपर हवा में किसी वस्तु पर टिका कर रखा जाना चाहिए। सीधे छत से संपर्क में नहीं रखना चाहिए।

बरामदे के लिए वास्तु:
वास्तु की मानें तो गैलरी और बरामदे घर के ऊपरी पूर्व दिशा में रखे जाने चाहिए, ऐसा करने से घर और परिवार के लिए कल्याणकारी सिद्ध होते हैं। ये परिवारजनों की भलाई का प्रतिनिधित्व करते हैं। और परिवार सम्पन्न होते हैं। अगर घर पश्चिम दिशा में बनाया गया हो तो भी इस तरह गैलेरी या बरामदा बनाया जा सकता है।

वास्तु के मुताबिक गैलरी की छत या शेड्स घर के मुख्य छत की तुलना में नीचे होनी चाहिए। इसके अलावा एक बरामदा बनाकर उस पर रंगीन रूफटॉप रखा जा सकता है। इसके कोने गोल नहीं होने चाहिए। ऐसा होगा तो अच्छा रहेगा।

घर की सीढ़ियों को लिए वास्तु:
किसी भी घर में सीढ़ियों को पूरा महत्व दिया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए भी क्योंकि सीढ़ियों को बनाने या पुनर्निर्माण में काफी पैसा खर्च हो जाता है। इसे बनाते समय पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। अगर किसी घर में सीढ़ियां बनाई जा रही हो तो उसे दक्षिण या पश्चिम क्षेत्र में सीढ़ियों का निर्माण किया जाना चाहिए। सीढिय़ां उत्तरी या पूर्वी दिशा में बनाना सही नहीं रहता है, ऐसा करने से घर में विवाद या संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। यह संघर्ष पैदा करता है।

बहरहाल, यहां सीढ़ियों के लिए कुछ वास्तु उपाय दिए गए हैं, जो सीढ़ियां बनाते समय होने वाली किसी भी गड़बड़ी से हमें बचा सकते हैं।

घर में जब भी सीढिय़ां बनाएं तो कभी भी सीढ़ियों के स्टेप या चरण 0 के साथ समाप्त नहीं होने चाहिए। जैसे 10, 20 अंक जितनी सीढिय़ां नहीं बनाई जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त चरण सम संख्याओं के साथ भी समाप्त नहीं होने चाहिए। व्यक्ति को लगातार पहले दायें पैर रखना चाहिए क्योंकि इसमें सबसे अच्छा भाग्य होता है और संख्या खत्म होने के साथ बाएं पैर को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए, ऐसा करना दुर्भाग्य को न्योता देता है। घर की सीढ़ियों के लिए वास्तु शास्त्र के नियमों की पालना करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए।

निवास पार्किंग स्थान के लिए वास्तु:
किसी भी प्रॉपर्टी का उत्तर-पश्चिम कोना एक आदर्श दिशा होती है। इसे कभी भी मकान की मौलिक संरचना से जोड़कर नहीं बनाया जाना चाहिए। वाहन उत्तर या पूर्व दिशा में पार्क किए जाने चाहिए न कि दक्षिण में क्योंकि इससे मालिक के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती है। हम यह भी अनुशंसा करते हैं कि कार पार्किंग क्षेत्र को हल्के रंग की रेखाओं से रंगा जाना चाहिए।


समापन

वास्तु हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सद्भाव और शांति आस पास बनाए रखता है। ऐसे में उन अच्छी चीजों को प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को निवास के भूखंडों या भवनों के लिए वास्तु के नियमों का पालन करना चाहिए। इसके साथ ही अपनी संपत्ति खरीदते समय वास्तु दिशा निर्देशों को ध्यान में रखना चाहिए। इससे आपको सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं और आपके परिवार के सदस्यों को भी अच्छा स्वास्थ्य मिल सकता है। इसके साथ, आशा है कि आपको इसे पढ़कर अच्छा लगा होगा।