बरगद का पेड़ ज्योतिष विज्ञान में क्या मायने रखता है?

हिंदू धर्म में बड़, बरगद का वृक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पेड़ अपना अस्तित्व स्वयं ही शुरू करता है। इसे लगाया नहीं जाता है। यह एक ऐसा पौधा होता है, जो उगता तो दूसरे पौधे पर है, लेकिन इसका अस्तित्व
सदियों तक बना रहता है। यह सैकड़ों सालों तक जीवित रहता है। यही कारण है कि इसे सबसे पुराना पेड़ माना जाता है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार बरगद के पेड़ में भगवान की शरण बताई जाती है। बरगद के पेड़ को हिंदू पौराणिक कथाओं में कल्पवृक्ष के रूप में भी जाना जाता है। कल्पवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जो भक्तों की मनोकामना पूरी करता है। भौतिक रूप से सभी लाभ प्रदान करता है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, बरगद के पेड़ की छाल में भगवान विष्णु का निवास होता है। पेड़ की जड़ों में भगवान ब्रह्मा और शाखाओं में शिव शंकर निवास करते हैं। इस तरह यह पेड़ त्रिमूर्ति की उपस्थिति का प्रतीक होता है। हम यहां बता देना चाहते हैं कि बरगद के पेड़ के ज्योतिषी लाभ असीमित हैं। हिन्दुओं के लिए बरगद का पेड़ एक विशेष महत्व रखता है।


बरगद के पेड़ की जड़ों के लाभ

ज्योतिष शास्त्र में मंगल को बरगद के पेड़ का स्वामी माना गया है। मंगल की शांति के लिए बरगद के पेड़ की जड़ या वट वृक्ष मूल को धारण करना भी शुभ माना जाता है। वट वृक्ष की मूल धारण करने से मंगल ग्रह से संतुलन बैठता है। बरगद के पेड़ की जड़ खाने से भी आप ब्रह्मा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इस जड़ को धारण करने से न केवल दिमाग शांत रहता है बल्कि एकाग्रता भी बढ़ती है। अगर इस जड़ को दूध के साथ मिला दिया जाए तो बांझपन भी दूर किया जा सकता है।

  • इसे पहनने से पहले जड़ को गंगाजल या कच्चे दूध से साफ कर लें।
  • जड़ को कपड़े में लपेटकर अपनी बांह या कलाई में बांध लें।
  • इसे लॉकेट में भी पहना जा सकता है।
  • ब्रह्मा जी को दीपक या अगरबत्ती चढ़ाते समय 108 बार मंगल मंत्र ‘ओम क्रां क्रीं क्रौं स: भौमे नम: का जाप करें।
  • इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद बुधवार या मंगलवार को या मेघशिरा, चित्रा और धनिष्ठा के नक्षत्रों में इस जड़ को धारण पहनें।

रुद्राक्ष का ब्रेसलेट कैसे पहनें

वनस्पति शास्त्र के अनुसार रुद्राक्ष के बीज के फल से बनी रुद्राक्ष की माला का उपयोग पापों से मुक्ति और कई तरह की बीमारियों को दूर करने के लिए किया जाता है। सुमात्रा, जावा, बाली, जया, नेपाल और इंडोनेशिया उन देशों में से हैं जहां रुद्राक्ष के पेड़ पाए जाते हैं। रुद्राक्ष को वेदों में एक पवित्र बीज बताया गया है। इसका उपयोग भगवान की पूजा करने और विभिन्न आध्यात्मिक कार्यों में किया जाता है।

रुद्राक्ष भगवान शिव से जुड़ा है, इसलिए जो कोई भी रुद्राक्ष का ब्रेसलेट पहनता है उसे महादेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ज्योतिषियों के अनुसार रुद्राक्ष के ब्रेसलेट में मौजूद हर रुद्राक्ष में कई तरह की शक्तियां होती हैं। ये किसी भी व्यक्ति को मनोवांछित सफलता दिलाने में मदद करती हैं। सभी बुरी ताकतों से बचाती है। ऐसे में व्यक्ति में सकारात्मकता भी बढ़ती है।


रुद्राक्ष का कंगन कैसे पहने

  • ब्रेसलेट को साफ करने के लिए सबसे पहले उसे गंगा जल या कच्चे दूध से अभिषेक करें।
  • इस दौरान भगवान शिव के मंत्र ऊं नम: शिवाय का 108 बार उच्चारणकरें।
  • ब्रेसलेट को हाथ या कलाई पर पहना जा सकता है।
  • ब्रासलेट पहनने के बाद मांसाहार और मादक पदार्थों के सेवन से परहेज करें।
  • इस ब्रासलेट को 12 से 14 घंटे तक पहने, इससे अधिकतम लाभ प्राप्त होगा।

नजर बट्टू (टर्किश इविल आई इंस्टॉलेशन)

ज्योतिष के अनुसार टर्किश इविल आई या नजर बट्टू एक ऐसा यंत्र होता है, जो आपको दूसरों की बुरी नजर से बचाता है। यह आपको सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं और नकारात्मक परिणामों से बचाती है। इसे आप अपने घर या ऑफिस के मुख्य द्वार पर लगा सकते हैं।

इसे लगाने की प्रक्रिया

  • नजर बट्टू को गंगाजल से साफ करें।
  • धूप या दीए से इस यंत्र की पूजा करें।
  • इसके बाद इसे अपने घर या ऑफिस के मुख्य द्वार पर टांग दें।
  • शनिवार के दिन इसे शनि की होरा में लगाएं।

काले घोड़े की नाल लगाने के कई फायदे

ज्योतिष के मुताबिक काले घोड़े की नाल को एक एक देवी के रूप में माना गया है। काले घोड़े की नाल शनि से जुड़ी होती है। जो इसे धारण करते हैं, उन पर शनिदेव की कृपा रहती है। घर और कार्यक्षेत्र में भी समृद्धि बनी रहती है। इसे घर के मुख्य द्वार या लिविंग रूम में लगाया जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि घर का मुख्य द्वार उत्तर, उत्तर पश्चिम या पश्चिम दिशा में हो तो घोड़े की नाल को घर के मुख्य द्वार पर रखना चाहिए। यह किसी भी हानिकारक ऊर्जा को भवन में प्रवेश करने से रोकता है। घर सुख और धन से भर जाता है।

काले घोड़े की नाल लगाने की प्रक्रिया

  • घोड़े की नाल को लगाने से पहले उसे गंगाजल या कच्चे दूध से साफ कर लें।
  • भैरव जी और शनिदेव को काले तिल, धूप, दीया या अगरबत्ती करनी चाहिए।
  • अर्पित करते समय शनि मंत्र का 108 बार जाप करें। ओम प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:।
  • शनिवार को सूर्यास्त के बाद घोड़े की नाल या पुष्य, अनुराधा, उत्तरा और भाद्रपद के नक्षत्रों में लगाएं।
  • घोड़े की नाल को लिविंग रूम में या सामने के दरवाजे पर लटका दें।

बरगद के पेड़ का हिंदू धर्म में महत्व

बरगद के पेड़ के छिलके, जड़ और शाखाओं में भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव निवास करते हैं। यह वृक्ष भगवान शिव का प्रतीक है। संतान चाहने वाले लोग इसकी पूजा करते हैं। चिरकाल तक रहने के कारण इस वृक्ष को अक्षयवट भी कहते हैं।

इसकी छाया हमारे मन पर गहरा प्रभाव डालती है। मन को शांत रखने में मदद है। जब हर तरफ सूखा होता है तो भी यह वृक्ष हरा भरा रहता है। पशु इसके पत्ते खाते हैं और लोग इसके फल खाते हैं। इसके छिलके और पत्तियों का इस्तेमाल दवा बनाने में किया जा सकता है। सुखी वैवाहिक जीवन और संतान के लिए इस वृक्ष की पूजा की जाती है।

बरगद के पेड़ के चारों ओर शनिवार को काला धागा तीन बार लपेटें। उसके पास दीपक जलाकर उसकी पूजा करें। बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर भी शनि मंत्र का 108 बार जाप कर सकते हैं। इससे व्यक्ति को राहु-शनि की समस्या से निजात मिलती है।

अगर संभव हो तो बरगद का पेड़ लगाएं। हर सोमवार को बरगद को जल से सींचे। ओम नमः: शिवाय का कम से कम 11 बार जाप करना चाहिए। आपको पुत्र प्राप्ति सहजता से होगी। बरगद के पेड़ पर पीले धागे, घास और पानी अर्पित करें।
पहले घी का दीपक जलाएं, फिर जड़ में जल और पुष्प अर्पित करें। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए उसकी पूजा करें।


बरगद के पेड़ की पवित्रता

हिंदू धर्म में वृक्ष पूजनीय माने जाते हैं। वे पूजनीय हैं और देवी-देवताओं से जुड़े होते हैं। वट, बरगद या बरगद का पेड़ हिंदू धर्म के सबसे पवित्र वृक्षों में से एक माना जाता है। सदियों तक जीवित रहने के कारण इसे भगवान के आश्रय के समान मानते हैं। इसके पत्ते काफी बड़े होते हैं। इनका इस्तेमाल पूजा व अर्चना में किए जाते हैं। यह प्राचीन काल से विभिन्न हिंदू रीति-रिवाजों से जुड़ा हुआ है।

बरगद के पेड़ को शाश्वत जीवन का प्रतीक माना जाता है। चूंकि उनकी जड़ें ऊपर रहती हैं। शाखाएं नीचे की ओर जाती हैं और जमीन से जुड़ जाती हैं। इसलिए इसे बाहुपद या कई पैरों वाले पेड़ के रूप में भी जाना जाता है। यह वृक्ष सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा, के साथ अमरता का प्रतिनिधित्व करता है।


बरगद का पेड़ उर्वरता का प्रतीक है

बरगद को भारत में बहुत सम्मान दिया जाता है। इसे एक दयालु और परोपकारी वृक्ष माना जाता है। इसकी बड़ी पत्तियों को अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों में काम में लिया जाता है। बरगद का पेड़ अमरता का प्रतीक है, इसकी विशेषताएं कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों और शास्त्रों में वर्णित है।

हिंदू पौराणिक कथाओं में, पेड़ के भौतिक लाभ भी बताए जाते हैं। बरगद प्रजनन क्षमता का प्रतीक है और उन लोगों की मदद कर सकता है जो संतान चाहते हैं। इस पेड़ को कभी काटा नहीं जाता है। यह सबसे लंबे समय तक रहता है, इसलिए यह जीवन का प्रतीक है। बरगद के पेड़ का उपयोग कभी-कभी यज्ञ में किया जाता है।


वट वृक्ष से जुड़े अनुष्ठान अवश्य करें

उत्तर भारत में महिलाओं को अक्सर बरगद के पेड़ की टहनियों में सूती धागे बांधते देखा जाता है। आम तौर पर मई या जून के महीने में महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं। इस दिन महिलाएं पूरे दिन उपवास करती हैं। यह सत्यवान सावित्री की लोकप्रिय कथा पर आधारित है। कहा जाता है कि ज्येष्ठ में पूर्णिमा के दिन, सत्यवान की मृत्यु इसी पेड़ के नीचे हुई थी। वह अपनी बुद्धि और सतित्व के बल पर अपने पति की आत्मा को यमराज से वापस लेने में सफल हुई थी। महिलाएं पूरे दिन उपवास रखती हैं और बरगद के पेड़ के तने के चारों ओर 108 बार सूती धागा बांधकर अपने पति की लंबी और सुरक्षित जीवन की प्रार्थना करती हैं।


अंत में...

बरगद का पेड़ सभी पेड़ों में सबसे प्राचीन और पवित्र माना जाता है। बरगद के पेड़ के कई फायदे हैं, यही वजह है कि आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। भलाई के अलावा बरगद के पेड़ की विशेष पूजा से लोगों को सुखी वैवाहिक जीवन और संतान की प्राप्ति होती है।