होली 2023 : जानें तिथि, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, महत्व और कथा

होली 2023 : जानें तिथि, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, महत्व और कथा

सर्वविदित है कि होली रंगों का त्योहार है और इसे प्राचीन भारतीय परंपरा में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसका आनंद सभी वर्गों के लोग बड़े ही हर्षोल्लास के साथ लेते हैं। साल 2023 में होली का त्योहार 7 मार्च, दिन मंगलवार को मनाया जाएगा। अगर हिंदू कैलेंडर की बात की जाए, तो यह त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह अक्सर मार्च के महीने या अप्रैल के महीने में पड़ती है।

होली के दिन भगवान विष्णु की पूजा करवाकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद पा सकते हैं…

होली का महत्व

रंगों के इस त्योहार को न सिर्फ भारत देश में बल्की दुनिया के कई हिस्सों में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, यह मस्ती और आनंद का पर्व है। इस त्योहार से जुड़ी कई परंपराएं है, जो दो दिनों तक जारी रहती है। इस दिन लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं। यह आपसी मतभेद मिटाने का सबसे अच्छा त्योहार है। इस दिन सब लोग सारे गिले शिकवे भूलकर प्रेम और भाईचारे के रंग में रंग जाते हैं। इस दिन पर रंगों का भी विशेष महत्व है, लोग एक दूसरे को रंग लगाकर, और व्यंजन खिलाकर प्यार बांटते हैं। साथ ही कई जगहों पर संगीत का भी आयोजन किया जाता है।

प्राचीन कथाओं के अनुसार यह माना गया है कि होली उत्सव का पहला दिन श्रीहरि विष्णु के भक्त प्रह्लाद की होलिका पर जीत की याद में मनाया जाता है, जो राक्षस राज हिरण्यकश्यप की बहन और भक्त प्रह्लाद की बुआ थी। इस दिन होलिका की चिता को जला जाता है। इसके अगले दिन रंग और गुलाल के साथ विशेष व्यंजनों का आनंद लिया जाता है। यह परंपराएं होली पर सबसे महत्वपूर्ण है।

होली पूजा का समय

त्योहारमुहूर्त
होलिका दहन7 मार्च, 2023 को रात 06:24 से रात 08:51 तक
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ6 मार्च, 2023 को दोपहर 4:17 बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त7 मार्च 2023 को शाम 06:09 बजे तक
गवाली होली (धुलेंडी)8 मार्च 2023

होली से जुड़ी कथा

होली के त्योहार से जुड़ी कई कथाएं पौराणिक ग्रंथों में मिलती है, लेकिन एक ऐसी कथा है जो सबसे ज्यादा प्रचलित है। इसी कथा के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का दैत्य राजा था। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान श्रीहरि विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने की कई कोशिश की, लेकिन हर बार प्रभु की कृपा से वह बच जाता था। तब उसने अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर प्रह्लाद को जलाने की योजना बनाई। लेकिन वह भी असफल रही। उसमें प्रह्लाद तो बच गए, लेकिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका जल गई। तभी से होलिका दहन किया जाता है। एक अन्य किंवदंती में कहा गया है कि भगवान शिव को कामदेव ने गहन साधना से भटका दिया था, जिसके परिणामस्वरूप शिव का पार्वती के साथ विवाह हुआ था। कामदेव को शिव ने वसंत पंचमी के चालीस दिनों के बाद बहाल किया था, जिसे होली के रूप में मनाया जाता है। ब्रज के क्षेत्रों में, राधा और कृष्ण के दिव्य संबंधों को मनाने के लिए होली मनाई जाती है।

होली का ज्योतिषीय महत्व

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होली उत्सव के दौरान सूर्य और चंद्रमा आकाश में एक दूसरे के विपरीत छोर पर होते हैं। सिंह और कन्या राशि के भावों में चंद्रमा जिस स्थान पर स्थित होता है, वह स्थिति शुभ होती है। जबकि सूर्य मीन और कुंभ राशि में स्थित होता है। राहु अक्सर धनु राशि में गोचर करता है। साथ ही, वास्तु विशेषज्ञ इसे वास्तु पूजा करने के लिए एक बहुत ही शुभ दिन मानते हैं। होलिका दहन और धुलेंडी यानी प्रतिपदा के दिन अपने घर, संपत्ति और वाहनों की वास्तु पूजा करना अत्यंत लाभकारी होता है। इससे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है। खास बात यह है कि इस दिन पवन देवता की पूजा करने के लिए लोग पतंग भी उड़ाते हैं।

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होली दहन की परंपराएं

होलिका दहन के दिन शहर, गांव, नगर या मोहल्ले के प्रमुख चौराहे पर होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ी या फिर गाय के गोबर से बने उपले जलाए जाते हैं। गांवों में आज भी गाय के गोबर से बनें उपलों की माला जलाने का रिवाज है। इसके लिए पहले से ही लकड़ी और उपलों का इंतजाम कर लिया जाता है, और फिर उसे एक ढेरी के रूप में एकत्रित किया जाता है और जलाया जाता है।

होलिका दहन उत्सव

होलिका दहन संध्या के समय आयोजित किया जाने वाला अनुष्ठान है। ऐसा माना जाता है कि होलिका अपने भाई के बेटे और भगवान श्रीहरि विष्णु के भक्त प्रह्लाद को जलाने के लिए बैठी थी। लेकिन वह खुद ही जल गई। इसलिए इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी माना जाता है। होलिका दहन के दौरान होलिका का पुतला भी रखा जाता है, और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्म मनाया जाता है। इस दिन लोग जीवन से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और समृद्धि व विकास लाने के लिए कुमकुम, चावल, नारियल, दीया, फूल, खजूर, और ज्वार पॉप या पफ बाजरा के साथ पूजा करते हुए अलाव के चारों ओर प्रार्थना करते हैं और परिक्रमा करते हैं।

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धुलेंडी

होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन लोग एक दूसरे पर रंग लगाते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। होली का उत्सव पूरे दिन चलता है, जिसमें लोग रंग खेलते हैं, गुलाल लगाते हैं, नाचते हैं, ढोल बजाते हैं और स्वादिष्ट व्यंजनों का लाभ उठाते हैं। हर वर्ग के लोग होली के रंग में रंगते हुए इस त्योहार को मनाते हैं।

उत्तर से दक्षिण तक पूरे भारत में रंग खेलने की परंपरा का पालन किया जाता है। होली के दिन लोग एक-दूसरे पर पिचकारी और एक-दूसरे के चेहरे पर रंग लगाना बेहद पसंद करते हैं। बॉलीवुड के गानों पर लोग मदमस्त होकर झूमते हैं। यहां तक कि कई जगहों पर रेन डांस का भी आनंद लिया जाता है।

रंगों के त्योहार पर प्रसिद्ध होली व्यंजन का आनंद

होली के इस त्योहार पर गुझिया, मालपुआ, पकोड़ी, दाल कचौरी, पानी पुरी, दही भल्ला, मसाला पुरी और बेक्ड कचौरी के साथ मसाला चना कुछ बहुत प्रसिद्ध व्यंजन है, जो इस त्योहार की खुशियों में एक अलग स्वाद जोड़ देते हैं।

धुलेंडी पर पिए जाने वाले पेय पदार्थ

होली का त्योहार केवल व्यंजनों तक ही सीमित नहीं है, इस दिन लोग ठंडाई, लस्सी, खीर और जल-जीरा जैसे प्रसिद्ध स्वादिष्ट पेय का आनंद लेकर आराम करना और इस रंगीन दिन का आनंद लेना पसंद करते हैं।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहें तो होली सभी भारतीयों के लिए एक विशेष त्योहार है, जो इसे पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। मस्ती से भरे इस दिन का समापन धुलेंडी की शाम को होता है, जब एक दूसरे से मिलते है और मिठाइयां खिलाते हुए शुभकामनाएं देते हैं। होली के दिन को और भी खास बनाने के लिए कई जगहों पर विशेष पार्टियों का आयोजन किया जाता है। वहीं इसमें भी कोई शक नहीं कि रंगों का यह त्योहार सद्भाव और भाईचारे के साथ मनाया जाता है।