अहोई अष्टमी 2023 कब है, आइए इसके विषय में जानते हैं?

अहोई अष्टमी 2023 कब है, आइए इसके विषय में जानते हैं?

अहोई अष्टमी की तिथि, समय और मुहूर्त

अहोई अष्टमीरविवार, 5 नवंबर 2023
अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त06:00 PM to 07:13 PM
अवधि01 घंटा 13 मिनट
तारों को देखने का समय06:21 PM
अहोई अष्टमी को चन्द्रोदय का समय12:38 पूर्वाह्न, 06 नवंबर
अष्टमी तिथि प्रारम्भ05 नवंबर, 2023 को 12:59 पूर्वाह्न
अष्टमी तिथि समाप्त06 नवंबर 2023 को 03:18 पूर्वाह्न

अहोई अष्टमी का महत्व

अहोई अष्टमी के दिन मां अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उपवास रखती है। शाम को आसमान में तारों को देखकर ही उपवास खोला जाता है। हालांकि, कहीं कहीं पर चंद्रमा को देखकर उपवास तोड़ने का रिवाज है। अहोई अष्टमी के दिन चंद्रमा देरी से दिखाई देता है, इसलिए इसका अनुसरण करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इस दिन माता अहोई यानी देवी पार्वती की पूजा की जाती है। महिलाएं इस दिन माता पार्वती से अपनी संतान की रक्षा और उनकी दीर्घायु की कामना करती है। जिन लोगों को संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ है, उनके लिए भी यह व्रत विशेष हैं। जिनकी संतान दीर्घायु न होती हो उनके लिए भी ये व्रत शुभकारी होता है। इस दिन माता पार्वती की विशेष पूजा करने से संतान प्राप्ति और कल्याण मिलता है। इस दिन उपवास आयुकारक और सौभाग्यकारक होता है।

अहोई अष्टमी का व्रत भी उत्तर भारत में काफी महत्वपूर्ण माना गया है। यहां अहोई अष्टमी का दिन अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह व्रत अष्टमी तिथि, जो कि माह का आठवां दिन होता है। इस उपवास को करना भी बहुत कठिन माना गया है। इस दिन महिला पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए, उपवास करती है, और रात को तारे दिखने के बाद ही उपवास खोलती है। परंपरागत रूप में यह व्रत केवल पुत्रों के लिए ही रखा जाता था, लेकिन अब इसे महिलाएं अपनी सभी संतानों के कल्याण के लिए रखती है। इस दिन महिलाएं उत्साह के साथ अहोई माता की पूजा करती है तथा अपनी संतानों की दीर्घ, स्वस्थ्य एवं मंगलमय जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके अलावा जो महिलाएं किसी कारणवश गर्भधारण नहीं कर पा रही है, या फिर किसी समस्या के चलते गर्भपात हो गया हो, उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए अहोई माता व्रत करना चाहिए।

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अहोई अष्टमी पूजा विधि

अहोई अष्टमी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लेना चाहिए। इसके दिन बाद दिनभर बिना कुछ खाए उपवास का पालन करना चाहिए। इसकी पूजा की तैयारी सूर्यास्त से पहले ही संपन्न की जाती है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले दीवार पर अहोई माता का फोटो लगाया जाता है। अहोई माता का चित्र अष्ट कोष्टक होगा, तो बेहतर रहेगा। उसमें साही (पर्क्यूपाइन) या अथवा उसके बच्चे का चित्र में अंकित करना चाहिए। उसके बाद लकड़ी की एक चौकी सजाना चाहिए, और माता के चित्र की बायी तरफ पवित्र जल से भरा हुए कलश रखा जाना चाहिए। कलश पर स्वस्तिक का चिह्न बनाकर मोली अवश्य बांध दें। इसके बाद दीपक अगरबत्ती आदि लगाकर माता को पूरी, हलवा तथा पुआ युक्त भोजन किया जाना चाहिए। इस भोजन को वायन भी कहा जाता है। इसके अलावा अनाज जैसे ज्वार अथवा कच्चा भोजन (सीधा) भी मां को पूजा में अर्पित किया जाना चाहिए। इसके बाद परिवार की सबसे बड़ी महिला सभी महिलाओं को इस व्रत की कथा का वाचन करना चाहिए। कथा सुनते समय याद रखें कि सभी महिलाएं अपने हाथ में अनाज के सात दाने रख लें। इसके बाद पूजा के अंत में अहोई अष्टमी आरती की जाती है। कुछ समुदायों में चाँदी की अहोई माता बनाई व पूजी जाती है। इसे स्याऊ भी कहते हैं। पूजा के बाद इसे धागे में गूंथ कर गले में माला की तरह पहना जाता है। पूजा सम्पन्न होने के बाद महिलाएं पवित्र कलश में से चंद्रमा अथवा तारों को अर्घ्य देती हैं, और उनके दर्शन के बाद ही अहोई माता का व्रत संपन्न होता है।

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चांदी की अहोई

अहोई अष्टमी के दिन कई लोग चांदी की अहोई बनाकर पूजा करते है, जिसे बोलचाल की भाषा में स्याऊ कहते है। आप चांदी के दो मोती लेकर एक धागे में अहोई और दोनों चांदी के दानें डाल लें। इसके बाद इसकी माता अहोई के सामने रखकर रोली, चावल और दूध से पूजा करें। अहोई माता की कथा सुनने के बाद इस माला को अपने गले में पहनें। इसके बाद चंद्रमा या तारों को जल चढ़ाकर भोजन कर व्रत खोलें।

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अहोई अष्टमी की कथा

अहोई अष्टमी को लेकर जो सबसे प्रचलित कथा है, उसके अनुसार एक महिला की सात संतान थी। एक दिन वह महिला अपने खेत पर मिट्टी खोदने के लिए गई थी। मिट्टी खोलते वक्त गलती से उसकी खुरपी एक साही (पर्क्युपाइन) के बच्चे को लग गई, जिससे उस बच्चे की वहीं पर मौत हो गई। इस बात से गुस्साए साही ने इस महिला को श्राप दे दिया। महिला ने इस बात को अनसुना कर दिया। कुछ दिन बाद उसके सातों बच्चों की मौत हो गई। तब महिला को उस साही (पर्क्युपाइन) के श्राप का ध्यान आया। तब उसने माता अहोई की पूजा कर छह दिन का उपवास रखा। जिससे प्रसन्न होकर माता अहोई ने उसे श्राप मुक्त कर इसके बच्चों को पुन: लौटा दिया। कई बार संतान का नहीं होना कुंडली में गलत ग्रहों के दुष्प्रभाव के कारण भी होता है। यदि आप भी ऐसी किसी समस्या से गुजर रहे हैं, तो आप हमारे विशेषज्ञ ज्योतिषियों से बात कर सकते हैं

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निष्कर्ष

भारत के उत्तर-मध्य राज्यों में इस व्रत को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। महिलाएं अपना संतान की रक्षा और उनके उज्जवल भविष्य के लिए इस उपवास को करती है। इस बार आप व्रत करके अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।

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