चैत्र पूर्णिमा 2022 (Chaitra Purnima 2022) : जानिए इसके अनुष्ठान व उनके महत्व के बारे में

हिंदू नववर्ष की शुरूआत चैत्र माह से होती है, इस माह को दक्षिण भारत में चिथिरई भी कहा जाता है। चिथिरई अथवा चैत्र मास की प्रथम पूर्णिमा को ही चैत्र पूर्णिमा (Chaitra Purnima) कहा जाता है। यह दिन भगवान चित्रगुप्त को समर्पित है, जो व्यक्ति के अच्छे और बुरे कर्मों का रिकॉर्ड रखते हैं। इस दिन सूर्य मेष राषि में उच्च का होता है और चन्द्रमा तुला राशि में होता है। धार्मिक श्रद्धालुजन अपने पूर्वजन्मों के पापों से मुक्ति पाने के लिए इस दिन गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं।

चैत्र पूर्णिमा को चित्रगुप्त जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। तमिलनाडु में मनाया जाने वाला यह महत्वपूर्ण त्यौहार हमारे लिए हमारे पापों से मुक्ति पाने का अवसर लेकर आता है। शास्त्रों में इस दिन गरीबों को खाना खिलाने के आदेश दिए गए हैं। माना जाता है कि इस दिन जो भी गरीबों को खाना खिलाता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।


वर्ष 2022 में चैत्र पूर्णिमा की तिथि और समय

दिनांक: 16 अप्रैल, 2022 – शनिवार
तिथि का समय:
पूर्णिमा तिथि का आरंभ – 16 अप्रैल, 2022 को दोपहर 02:25 AM बजे
पूर्णिमा तिथि का समापन – 17 अप्रैल, 2022 को पूर्वाह्न 12:24 AM


चैत्र पूर्णिमा का महत्व

जब सूर्य और चन्द्रमा का मिलन होता है तब चैत्र पूर्णिमा मनाई जाती है। चैत्र पूर्णिमा को ही चित्रगुप्त जयंती होने के कारण इस दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा का भी विशेष महत्व है। चित्रगुप्त दो शब्दों के संयोग से बना है, ‘चित्र’ चित्रों को संदर्भित करता है, और ‘गुप्त’ सीक्रेट्स को दर्शाता है। भगवान चित्रगुप्त को भगवान यम का छोटा भाई कहा जाता है। व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा रखकर भगवान चित्रगुप्त यमराज की सहायता करते हैं। चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर, श्रद्धालुजन ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए नदी के किनारे या आसपास की झीलों पर पूजा करते हैं।

चैत्र पूर्णिमा के दौरान, अनामला की पहाड़ियों पर हजारों तीर्थयात्रियों की भीड़ लगती है। ये सभी श्रद्धालु यहां 14 किलोमीटर लंबी पैदल प्रदक्षिणा करते हैं और उपवास रखते हैं। इस विशेष दिन पर, भक्त बड़ी संख्या में कांचीपुरम के चित्रगुप्त मंदिर में भी एकत्रित होते हैं, यह मंदिर दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग अपने अच्छे और बुरे कर्मों के बीच फंसे रहते हैं, उन्हें बार-बार इस संसार में जन्म और मृत्यु के चक्र में पिसना पड़ता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है।


पौराणिक कथा

प्राचीन पवित्र शास्त्रों के अनुसार, चैत्र पूर्णिमा की कहानी देवराज इंद्र तथा उनके गुरु बृहस्पति से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार एक बार देवराज इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति का अपमान कर दिया जिसकी वजह से उन्हें बाद में पछतावा होने लगा। इस पर देवगुरु गुरु बृहस्पति ने एक मार्गदर्शक और संरक्षक होने के नाते, इंद्र को अपने बुरे कर्मों का नाश करने के लिए पृथ्वी की तीर्थ यात्रा करने का निर्देश दिया।

उनकी आज्ञा से देवराज इंद्र तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े। तीर्थयात्रा के दौरान, इंद्रदेव को कदंब वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग मिला। बाद में, उन्होंने महसूस किया कि भगवान शिव ही उनके बुरे कर्मों का नाश करने में उनकी मदद कर रहे थे। यह जानकारी होने पर उन्होंने कमल के फूल चढ़ाकर भगवान शिव की पूजा करना शुरू कर दिया। यह घटना तमिलनाडु के मदुरै में चिथिरई महीने की पूर्णिमा के दिन हुई थी। तब से, भक्त भगवान की पूजा करने के लिए मदुरै के प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर में पूजा करते हैं।


चैत्र पूर्णिमा पर पूजा करने के लाभ

चैत्र पूर्णिमा के दौरान पूजा करने वाले भक्तों के पूर्वजन्म के पापों का नाश होता है। यह पर्व हमें गलत कामों से दूर रहने और सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलने की याद दिलाता है। सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना करने वाले भक्त सहज ही अपने मन से नकारात्मक विचारों को दूर कर सकते हैं।

बहुत से लोग इस दिन ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ, मंत्र जाप तथा अनेकों अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। उनका मानना है कि इससे भगवान प्रसन्न होते हैं, पापों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। इनके अतिरिक्त व्यक्ति के अंदर छिपी नेगेटिविटी समाप्त होकर उसमें सकारात्मक ऊर्जा आती है।

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चैत्र पूर्णिमा कैसे मनाते हैं?

इस शुभ अवसर पर लोग विशेष प्रार्थना करते हैं और भगवान को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न समारोह आयोजित करते हैं। वे पास की पवित्र नदियों में भी स्नान करते हैं। इसके अलावा, अशुभ केतु के बुरे प्रभाव को समाप्त करने के लिए चित्रगुप्त की पूजा करते हैं। कुछ लोग तैलीय और मसालेदार भोजन से परहेज करके एक दिन का उपवास भी रखते हैं। वे इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को भोजन और कपड़े भी दान करते हैं।

इसके अलावा, इस दिन नवधान्यम अनुष्ठान (अर्थात् भगवान को नौ अलग-अलग धान या भोज्य पदार्थों का भोग लगाना) भी किया जाता है। ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी धार्मिक कार्य राहु काल अथवा यम कंदम में नहीं किए जाने चाहिए। लोग एक थाली में पान, मेवा, नारियल या केला रखते हैं और भगवान की पूजा करने के लिए अगरबत्ती जलाते हैं। बाद में, वे मंगला आरती करके पूजा समाप्त करते हैं।


आखिर में

अब हम जानते हैं कि चैत्र पूर्णिमा को हिंदुओं के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक क्यों माना जाता है? वस्तुत: यह भारत के दक्षिणी राज्यों में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन हमें भगवान चित्रगुप्त के नाम का स्मरण करके अपने बुरे कर्मों को कम करने का अवसर प्रदान करता है। जो कोई भी इस दिन पूजा करता है उसे चित्रगुप्त के साथ-साथ यमराज का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।