जानिए अपरा एकादशी का महत्व क्या है

हिंदू धर्म में अपरा एकादशी को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। इसे ज्येष्ठ विष्णु एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन जो लोग उपवास रखते हैं, उन्हें हर अपराध से मुक्ति मिल जाती है। वह किसी भी अपराध के लिए खुद को क्षमा करने में सक्षम होते हैं, जो उसने पिछले जन्म में किए हो। अपरा एकादशी अपने उपासकों के लिए धन और समृद्धि लेकर आती है।

यह त्योहार साल 2022 में 18 मई को मनाया जाएगा। एकादशी शीतकालीन संक्रांति के अनुसार चंद्र ग्रहण के 11 वें दिन मनाई जाती है।


अपरा एकादशी का महत्व

‘विष्णु सूत्र’ अपरा एकादशी के महत्व पर जोर देता है। अपरा एकादशी के बारे में सबसे पहले भगवान विष्णु ने युधिष्ठर को बताया था। कृष्ण अवतार में उन्होंने युधिष्ठर को बताया कि एकादशी का व्रत करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्मार्थ कार्यों के लिए प्रसिद्ध होगा। जो व्यक्ति अपनों किए हुए पाप का पश्चाताप करना चाहता है, उसके लिए एकादशी का व्रत अत्यंत सहायक है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने महाभारत के युद्ध से पहले युधिष्ठर को अपरा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी थी।

यदि यह उपवास किया जाता है कि पिछले जन्म में किए गलत कामों से छुटकारा मिल जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की सच्चे मन से प्रार्थना करना चाहिए। अपरा एकादशी व्रत मनुष्य के लिए समृद्धि और धन लाता है। अपरा एकादशी के उपासक धार्मिक महीने कार्तिक में यदि पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं, तो उन्हें और भी अधिक लाभ मिलता है। यदि पशुदान और पवित्र यज्ञों का पालन करने के समान है।


अपरा एकादशी का इतिहास

माना जाता है कि इस व्रत का आयोजन सम्राट महिद्वज के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए किया गया था। जो बाद में एक देवदूत और निष्पक्ष शासक बने। सम्राट महिद्वज के छोटे बेटे वज्र ध्वज ने उनकी मान्यताओं की अव्हेलना करते हुए हत्या कर दी थी, और उनके अवशेषों को एक पीपल के पेड़ के नीचे दफन कर दिया था। मोक्ष न मिलने के कारण राजा महिद्वज की आत्मा उस क्षेत्र में भटक रही थी। तभी एक दिन सुबह के वक्त एक ऋषि पौधे से प्रकट हुए और राजा महिद्वज की आत्मा से टकराए।

तब राजा महिद्वज ने अपनी सारी कहानी ऋषि को बताई और मोक्ष प्राप्त करने में उनकी सहायता की मांग की। इसी पर ऋषि ने खुद राजा को मुक्ति दिलाने के अपरा एकादशी का उपवास रखा, और राजा महिद्वज को मोक्ष दिलाई। इसके बाद भगवान कृष्ण ने राजा का सम्मान करते हुए उसे अमरता प्रदान की। अपरा एकदाशी और भगवान कृष्ण के आशीर्वाद के कारण ही राजा महिद्वज को अमरता का वरदान मिला। तभी से सकारात्मक इरादों का अभ्यास करने और मोक्ष के मार्ग को सरल बनाने के लिए अपरा एकादशी का व्रत किया जाता है।

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अपरा एकादशी के अनुष्ठान

जो भी उपासक अपरा एकादशी का व्रत रखता है, इससे दिन निकलने से पहने उठना चाहिए। इसके बाद नित्य क्रिया कर स्नान कर लेना चाहिए।

अपरा एकादशी की सभी प्रक्रियाओं को करते समय आपके अंदर विश्वास की भावना को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। यह अपने उपासकों को हमेशा वरदान देती है।

उपासकों को भगवान की पूजा करने के साथ-साथ अगरबत्ती, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाने की आवश्यकता होती है।

साथ ही भगवान की आरती करनी चाहिए, इसके बाद सभी को प्रसाद का वितरण करना चाहिए।

प्रसाद वितरण के बाद आप भगवान विष्णु के मंदिर जाकर वहां उनके दर्शन कर सकते हैं, इससे आपको भगवान विष्णु का द्विव्य आशीर्वाद प्राप्त होगा। अपरा एकादशी के समारोह की शुरुआत दसवें दिन से ही हो जाती है।

इस उपवास को करने वाले उपासक यदि सात्विक हो, तो बेहतर होगा। वहीं उपवास खोलने के लिए आपको सात्विक भोजन करना चाहिए, और सूर्यास्त से पहले भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए।

यह व्रत एकादशी तिथि के पूरा होने तक चलता है।

इस व्रत के उपासकों को शाम के समय सोने की अनुमति नहीं है। भगवान विष्णु (कृष्ण) को प्रसन्न करने आप अपना सारा समय उनके जयकारों और कथाएं पढ़ने में लगाना चाहिए।

“कृष्ण सहस्रनाम” का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। अनुयायी अपरा एकादशी के दिन सच्चे मन और सद्भाव के साथ भगवान कृष्ण की स्तुति करें, यह आपके लिए लाभकारी साबित होगा।

अपरा एकादशी की पूर्व संध्या धर्मार्थ संगठन को बढ़ावा देना बेहद अच्छा माना जाता है। साथ ही आप ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र और उपहार भेंट कर सकते हैं।


अपरा एकादशी की कथा

अपरा एकादशी के दिन इसकी कथा को अवश्य सुनना चाहिए। चलिए हम आपको इसकी कथा सुनाते हैं। भगवान कृष्ण की कहानी के अनुसार, प्राचीन काल में एक महिद्वज नामक एक राजा रहता है, जो काफी न्यायप्रिय और धार्मिक थी। वह अपने राज्य के लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाता था। राजा का अच्छा व्यवहार उनके छोटे बेटे को बिल्कुल पसंद नहीं था, इसीलिए उसने मन ही मन में दुश्मनी पाल रखी थी। उसके अंदर राजा महिद्वज को लेकर इतनी ईर्ष्या बढ़ गई है, उसने राजा की हत्या करने का मन बना लिया और एक दिन मौका देखकर राजा की हत्या कर दी।

राजा महिद्वाज की हत्या करने के बाद उनके हत्यारे बेटे वज्रध्वज ने उसे पीपल के पेड़ के नीचे दफना दिया। दुर्भाग्यपूर्ण और अकास्मिक मौत के कारण राजा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई थी। परिणामस्वरूप वह उसी पीपल के पेड़ के नीचे भूत बनकर रहने लगे। साथ ही हर आने जाने वाले को सताने लगने।

वक्त बीतता गया। एक दिन एक ऋषि वहां से गुजर रहे थे कि उन्हें वहां भूत की उपस्थिति महसूस हुई। उन्होंने अपने अलौकिक शक्तियों के कारण राजा महिद्वज से संपर्क किया और उनसे उनकी मौत का कारण पूछा। उन्होंने महिद्वज की चेतना को बुलवाया और उसकी कहानी के बारे में पता किया। तभी राजा महिद्वज ने उनसे मोक्ष दिलवाने में मदद करने की प्रार्थना की।

तभी ऋषि ने राजा महिद्वज के लिए अपरा एकादशी व्रत का पालन किया और साथ ही आत्मा को पुनर्जन्म प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सभी शिक्षाओं को महद्वाज में स्थानांतरित कर दिया। महिद्वज की आत्मा मुक्त हो गई, जिसने उपवास और भगवान कृष्ण की कृपा के परिणामस्वरूप अमरता प्राप्त की।

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अपरा एकादशी व्रत के नियम

एकादशी का व्रत दशमी से शुरू होकर द्वादशी तक चलता है। एकादशी के दिन भक्तों को जल्दी उठकर गंगाजल से स्नान करना चाहिए। अगर गंगाजल उपलब्ध नहीं है, तो ताजे और शुध्द जल से भी स्नान कर सकते हैं। साथ ही नए कपड़े पह नकर तैयार होना चाहिए। आपको याद रखना है कि अगर आप उपवास कर रहे हैं, तो आपको कुछ भी खाने की मनाही है। साथ ही यह भी बताते चलें कि एकादशी की पूर्व संध्या पर आपको सात्विक आहार का सेवन करना चाहिए।

अपरा एकादशी के दिन उपासक भगवान विष्णु की मूर्ति पर फूल, पान, नारियल और अन्य सामान चढ़ा सकते हैं। इसके बाद आपकी जो भी इच्छा है, उसे भगवान कृष्ण (विष्णु) के सामने प्रस्तुत करें, और भगवान को नमन करें। इसके बाद शाम के समय भगवान विष्णु की मूर्ति के पास एक दीया जलाएं। इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने का बहुत महत्व होता है। मूर्ति पूजा करने के बाद अपने आसपास के लोगों को प्रसाद वितरण करें।

आपको इस बात की भी विशेष ख्याल रखना चाहिए कि जो व्यक्ति उपवास रखता है, उसे आधी रात यानि एकादशी पूरी होने तक सोना नहीं चाहिए। इसके अलावा इस दिन प्याज-लहसुन खाने से बचना चाहिए। आप अपने लिए जो भी पकवान बनाएं, उसमें प्याज-लहसून का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वहीं आपको इस उपवास के एक हफ्ते पहले से चावल का सेवन नहीं करना चाहिए, और एक हफ्ते बाद तक चावल न खाएं।

इस उपवास के करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। वह लोगों के अंदर से नकारात्मक भावों को दूर करते हैं। साथ ही पुनर्जन्म के मार्ग पर प्रगति के लिए आशीर्वाद देते हैं।