सफला एकादशी 2022: जानिए तिथि, मुहूर्त, व्रत विधि, कथा और महत्व के बारे में

पौष मास, कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) कहा जाता है। 2022 में यह शुभ तिथि 19 दिसंबर को पड़ रही है। इस दिन जो भगवान विष्णु की विधिवत आराधना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

इस व्रत को करने के लिए मौसम के अनुकूल फल -फूल, नींबू और अन्य वस्तुओं को मिलाकर 16 वस्तुओं से पूजा आराधना करने और रात्रि जागरण करने पर, उपासक को पाँच हजार वर्ष तक तप करने के समान फल मिलता है। विष्णु जी के साथ – साथ लक्ष्मी जी का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है इस पूजा से जिससे धन – संपत्ति में वृद्धि होती है।

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सफला एकादशी व्रत की कथा

प्राचीन समय में महिष्मान नाम के राजा चम्पावती नगरी में राज्य करते थे। उनके 4 पुत्र थे, लेकिन उनमे सबसे बड़ा पुत्र जिसका नाम लुम्पक था वह बहुत बड़ा पापी था। वह सदा परायी स्त्री पर नजर रखता था और वेश्यागमन तथा अन्य बुरे कर्मो में धन नष्ट करता था। वह नास्तिक भी था, आये दिन वह देवताओं, ब्राम्हण और वैष्णवों की निंदा करता। उससे सभी ब्राम्हण और ऋषि-मुनि अत्यंत परेशान थे। फिर एक दिन राजा के पास उनके गुप्तचरों द्वारा उनके बड़े पुत्र लुम्पक के सभी कुकर्मों का पता चला। जिसके बाद उन्होंने उसे दरबार में बुलाकर सबके सामने उसके दोषों को बताते हुए, उसे राज्य से बाहर निकाल दिया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? कहा जाए?

लुम्पक जो पहले से ही बुरे कर्मों में लिप्त था, उसने चोरी करने का निश्चय किया। दिन के समय वह जंगल में रहता और रात के पहर में वह अपने पिता की नगरी में चोरी करता। किसी के द्वारा रोके जाने पर वह हत्या करने का कुकर्म भी करने लगा। कुछ समय पश्चात नगरी भयभीत रहने लगी जिसके कारण राजा ने सैनिकों को रक्षा के लिए लगा दिया। अब वह जंगल में रहकर पशुओं को मारकर खाने लगा। वन में एक अतिप्राचीन विशाल पीपल का वृक्ष था जिसकी लोग पूजा करते थे, उसी पेड़ के नीचे वह पापी लुम्पक रहता था। 

ठण्ड के मौसम में पौष कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वस्त्रहीन होने के कारण लुम्पक सारी रात सो नहीं पाया। उसके हाथ पेअर अकड़ गए और वह बेहोश हो गया। एकादशी के दिन मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसे होश आया। गिरते – पड़ते वह भोजन की तलाश में निकला। मूर्छा के वजह से वह पशुओं को मारने में असमर्थ था, तो उसने पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आते – आते सूर्य अस्त हो चूका था। 

गांव के लोग जिस पीपल की पूजा करते थे उस वृक्ष को सभी भगवान का क्रीड़ास्थल मानते थे। थका हारा लुम्पक उन फलों को उस पेड़ के निचे रख दिया और कहा भगवान मेरा तो भोजन इससे होगा नहीं, कम से कम आप ही तृप्त हो जाइए। अपनी हालत पे दुःख के कारण उस रात्रि उसे नींद नहीं आई। इस उपवास और जागरण से भगवान प्रसन्न होकर उसके सारे पाप नष्ट कर दिए। यह एकादशी सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) थी जिसके वजह से लुम्पक अपने पापों से मुक्ति पाकर सुख, समृद्धि की और अग्रसर हुआ। 

द्वादशी तिथि के दिन एक ‍अतिसुंदर घोड़ा उसके सामने आकर खड़ा हो गया। तभी आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्री हरी की कृपा से तेरे सभी पाप नष्ट हो गए हैं अब तुम जाकर अपने पिता का राज-काज संभालो। आकाशवाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न होकर, दिव्य वस्त्र धारण करके भगवान की जयकार करते हुए अपने पिता के पास पहुंचा। सारा वृतांत सुनकर पिता अपना राज्य उसे सौंपकर वन को प्रस्थान कर गए। लुम्पक ने शास्त्रानुसार राज्य किया और अंत समय में अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन को प्रस्थान कर गया। एकादशी के प्रभाव और भगवान की उपासना से उसे बैकुंठधाम प्राप्त हुआ।

सफला एकादशी का महत्व

सफला एकादशी करने वाले उपासक को सौ राजसूय यज्ञों से ज्यादा पुण्य फल प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से मनुष्य जीवन में सफल और समृद्ध हो जाता है। इससे सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से यश, वैभव और कीर्ति में वृद्धि होती है।

सफला एकादशी की व्रत विधि

  • सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) के दिन जल्दी उठ जाएं। नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नान करें।
  • स्वच्छ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प ले और सूर्यदेव को जल चढ़ाएं।
  • विष्णु जी को पीले रंग के फूल और पीले वस्तुओं को अर्पित करें।
  • धूप, दीप, फल, नारियल, सुपारी, आंवला अनार, लौंग और पंचामृत आदि अर्पित कर भगवान की पूजा-अर्चना करें।
  • इसके बाद आरती, चालीसा, मन्त्र और भगवान के सहस्त्र नामो का पाठ करें।
  • 108 बार “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें।
  • इस दिन दान का विशेष महत्व होता है, अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करें।
  • श्री हरि के नाम के भजन से रात्रि जागरण करें। 
  • द्वादशी के दिन व्रत समाप्त करें।
  • ब्राम्हणो और जरूरतमंदों को भोजन करवाएं और दान दक्षिणा दान करके विदा करें।
  • अब आप भी भोजन करें।

सफला एकादशी की पारण विधि

पारण का अर्थ है व्रत तोड़ना। द्वादशी तिथि समाप्त होने के भीतर ही पारण करें। द्वादशी में पारण न करना अपराध के समान है। व्रत तोड़ने से पहले हरि वासरा के खत्म होने का इंतजार करें, हरि वासरा के दौरान पारण नहीं करना चाहिए। मध्याह्न के दौरान व्रत तोड़ने से बचें। व्रत तोड़ने का समय प्रात:काल है। किसी कारणवश प्रात:काल के दौरान व्रत नहीं तोड़ पाते हैं तो मध्याह्न के बाद व्रत ख़तम करें।

सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) व्रत तिथि व मुहूर्त

एकादशी व्रत तिथि19 दिसंबर 2022, दिन - सोमवार
पारण का समय08:05 AM से 09:24 AM (20 दिसंबर 2022)
पारण के दिन द्वादशी तिथि समाप्त08:05 AM (20 दिसंबर 2022)
एकादशी तिथि प्रारंभसुबह 03:32 बजे से (19 दिसंबर 2022)
एकादशी तिथि समाप्तशाम 02:32 बजे तक (20 दिसंबर 2022)