नवरात्रि किस दिन कौन सा प्रसाद चढ़ाएं ?

नवरात्रि रंगों का त्योहार है, नवरात्रि के दौरान कई धार्मिक आयोजनों का आयोजन किया जाता है और भक्तों को प्रसादी का वितरण किया जाता है। देवी के नौ रूपों को अलग अलग भोग लगाया जाता है, और उसी आधार पर प्रसादी वितरण भी किया जाता है। नवरात्रि हिंदू कैलेंडर के अश्विन महीने में आती है, और यह नौ दिन और रात तक चलती है। 

दुर्गा पुराण में बताया गया है कि देवी दुर्गा ने स्वयं महिषासुर नामक राक्षस का वध किया है, इसीलिए उनकी उत्पत्ति हुई थी। महिषासुर के आतंक से बचने के लिए ही देवताओं ने दिव्य शक्ति से देवी दुर्गा को उत्पन्न किया था। महिषासुर और देवी दुर्गा का यह युद्ध नौ दिनों तक चला था, इसीलिए यह पर्व नौ दिनों तक मनाया जाता है।

मां दुर्गा शेर की सवारी करती है, और इसी रूप में उनकी मूर्ति को भी विकसित किया जाता है। उनकी 8-10 भुजाएं है, जिसमें प्रत्येक देवता द्वारा दिए गए हथियार सुशोभित होते हैं। नवरात्रि के पावन पर्व पर भक्त माता की आराधना करते हैं, और उनके नौ रूपों की पूजा करते हैं। साथ ही उनको भोग भी लगाया जाता है।

देवी के ये नौ अवतार शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं। भक्त सकारात्मकता, निडरता और मोक्ष पाने के लिए पूरी ईमानदारी से मिठाई और फल अर्पित कर माता से प्रार्थना करते हैं। कई भक्त माता को प्रसन्न करने के लिए नौ दिनों तक उपवास भी रखते हैं। इस दौरान, भक्त नौ दिनों तक अलग अलग प्रसाद तैयार करते हैं। आज हम आपको इसी प्रसाद के बारे में बताएंगे, कि आपको किस दिन कौन सा प्रसाद बनाकर माता को भोग लगाना चाहिए।


नौ दिनों के लिए नवरात्रि प्रसाद

नवरात्रि उत्सव के दौरान, भक्त ताजे फूल, अगरबत्ती, धूप और प्रसाद का भोग चढ़ाते हैं। आइए जानते हैं किस दिन माता को कौन सा प्रसाद भोग स्वरूप चढ़ाना चाहिए…

देवी शैलपुत्री

देवी शैलपुत्री देवी पार्वती का एक अवतार हैं, जिनका जन्म पर्वत के भगवान की बेटी के रूप में हुआ था। यहाँ ‘शैल’ शब्द का संस्कृत में अर्थ पर्वत होता है, इसीलिए इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। माता शैलपुत्री एक बैल पर विराजमान होती है। नवरात्रि के पहले दिन इनकी पूजा की जाती है। अच्छे स्वास्थ्य और भाग्य के रूप में आशीर्वाद पाने के लिए इस दिन उन्हें शुद्ध घी के रूप में भोग लगाएं।

देवी ब्रह्मचारिणी

राजा दक्ष प्रजापति के घर जन्मी पार्वती देवी सती के रूप में अवतरित हुई थी। वह बचपन से ही भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी। इसलिए अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने घोर तपस्या की। उनके दृढ़ संकल्प से प्रभावित होकर, उन्हें भगवान ब्रह्मा ने उनके अविवाहित रूप को पुज्यनीय होने का आशीर्वाद दिया। तभी से माता का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ गया है और उनको पूजा जाने जाना लगा। मां ब्रह्मचारिणी को दो हाथ और नंगे पैर चलने के रूप में दर्शाया गया है। नवरात्रि के दूसरे दिन इनकी पूजा की जाती है। दूसरे दिन माता को चीनी का भोग लगाया जाता है, जो आपके परिवार के सदस्यों को लंबी उम्र का आशीर्वाद देता है।

देवी चंद्रघंटा

देवी चंद्रघंटा देवी पार्वती का विवाहित रूप है। भगवान शिव से विवाह करने के बाद, उन्होंने अपने माथे को अर्धचंद्र से सजाना शुरू कर दिया था। इसलिए, वह चंद्रघंटा के मान से जानी जाने लगी। माता का यह रूप बाघिन पर सवार होता है। नवरात्रि के तीसरे दिन इनकी पूजा की जाती है। इन्हें खीर या दूध से बनी कोई मिठाई चढ़ाने से व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति मिल सकती है।

देवी कूष्मांडा को चढ़ाया गया प्रसाद

देवी कुष्मांडा देवी सिद्धिदात्री का भौतिक रूप हैं। उनके पास सूर्य के अंदर रहने की शक्ति और ऊर्जा है। उनके पास सूर्य के सामान तेज है, उनके आठ हाथ हैं, और वह बाघ पर सवार है। नवरात्री के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा की जाती है। इस दिन मालपुआ भोग के रूप में अर्पित कर प्रसादी वितरण करना आपको बुद्धि का आशीर्वाद देता है। ऐसा माना जाता है कि जो भी इस दिन उपवास करता है, उसे लंबे समय से चली आ रही बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है।

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देवी स्कंदमाता

जब देवी पार्वती भगवान कार्तिकेय की माँ बनीं, तो उन्हें देवी स्कंदमाता के रूप में जाना जाने लगा, जिसका अर्थ है स्कंद की माँ। भगवान कार्तिकेय का दूसरा नाम स्कंद भी है। नवरात्रि के पांचवां दिन स्कंदमाता को समर्पित है। इन्हें भोग के रूप में केला चढ़ाया जाता है। अगर माता आपकी भक्ति से प्रसन्न हो जाती है, तो आपको  समृद्धि और स्वस्थ शरीर का आशीर्वाद देती है।

देवी कात्यायनी

राक्षस महिषासुर को हराने के लिए देवी दुर्गा ने कात्यायनी का रूप धारण किया था। देवी कात्यायनी देवी पार्वती का एक योद्धा रूप हैं, जो उनके प्रतिशोध के कारण सबसे उग्र हैं, जिससे राक्षस महिषासुर का विनाश हुआ था। छठे दिन माता कात्यायनी के स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी कात्यायनी को शहद चढ़ाया जाता है, क्योंकि इससे भक्तों को अपने क्रोध को सकारात्मक दिशा में निर्देशित करने में मदद मिल सकती है।

देवी कालरात्रि

मां दुर्गा का सबसे हिंसक और क्रूर रूप मां कालरात्रि है। वह दो शातिर राक्षसों, चंद और मुंड को मारने के लिए जानी जाती है। उन्हें नकारात्मक ऊर्जाओं का संहार करने वाली देवी के रूप में भी जाना जाता है। देवी कालरात्रि का यह रूप एक घातक लोहे की हुक और हाथों में तलवार के साथ गधे पर सवार रहती हैं। नवरात्रि के सातवें दिन इस रूप की पूजा की जाती है। बीमारियों और दूखों को दूर करने के लिए माता कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाया जाता है।

देवी महागौरी

देवी महागौरी पवित्रता और सुंदरता की प्रतीक हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब देवी पार्वती राक्षसों से लड़ने के लिए गई थी, तो उन्होंने अपना शुद्ध भाग कैलाश पर्वत पर छोड़ दिया। उनका यह गोरा रूप महागौरी के नाम से जाना जाता है। देवी महागौरी अपने भक्तों को उनके सभी कार्यों और धन में सफलता का आशीर्वाद देती हैं। भक्त माता का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी मूर्ति के पास नारियल चढ़ाते हैं।

देवी सिद्धिदात्री

देवी सिद्धिदात्री का कोई भौतिक रूप नहीं है, यह केवल देवी की दिव्य शक्ति है। ब्रह्मांड के निर्माण के लिए इस रूप की पूजा की जाती है, और भगवान शिव इस अवतार के साथ मिलकर अर्धनारीश्वर बनाते हैं, जो ब्रह्मांड में पुरुषत्व और स्त्रीत्व का प्रतीक है। सिद्धिदात्री कमल के फूल पर विराजमान हैं। नवरात्रि के अंतिम दिन उनकी पूजा की जाती है, क्योंकि उन्हें शुरुआत और अंत के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। उन्हें तिल के बीज भोग के रूप में अर्पित किए जाते हैं। बदले में, वह अपने भक्तों को परम आराम और शांति का आशीर्वाद दे सकती है।


समापन

उम्मीद करते हैं अब आप जान गए होंगे कि मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को क्या अर्पित करें। वैदिक आधार पर माता को भोग लगाने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त हो सकती है। साथ ही आप एक शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन जी सकते हैं। नौ दिवसीय उत्सव मां दुर्गा के सभी रूपों की पूजा करने के अवसरों के साथ आता है। यदि आप इन शुभ दिनों में उनके सभी नौ रूपों की पूजा करते हैं, तो आपको जीवन में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।