विश्वकर्मा पूजा 2022 में कब है

हिंदू धर्म में देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा को ही समस्त यांत्रिक ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। विश्वकर्मा जयंती पर उनकी पूजा की जाती है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार सभी हिंदू देवी – देवताओं के अस्त्र-शस्त्र विश्वकर्मा के ही द्वारा बनाए गए हैं। इस दिन उनके अनुयायी तथा भक्त पूजा कर उनका आशीर्वाद लेते हैं तथा अपने टेक्निकल प्रोफेशन में एक्सपर्टीज पाने के वरदान की कामना करते हैं।


भारत में विश्वकर्मा पूजा का इतिहास (History of Vishwakarma Puja in India)

महाभारत तथा स्कन्द पुराण में विश्वकर्मा की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। इन दोनों के ही अनुसार महर्षि अंगिरा की पुत्री भुवना का विवाह महर्षि प्रभास से हुआ था। उन दोनों के संयोग से ही शिल्पकला तथा अन्य सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। एक अन्य किंवदंती के अनुसार विश्वकर्मा को ब्रह्मा का भी पुत्र माना जाता है।

भारत के अलग-अलग भागों में अलग-अलग समय पर विश्वकर्मा जयंती पूरे जोरशोर से मनाई जाती है। सर्वमान्य परंपरा के अनुसार भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा कन्या की संक्रान्ति को विश्वकर्मा दिवस मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त कार्तिक शुल्क प्रतिपदा (गोवर्धन पूजा), माघ शुक्ल त्रयोदशी एवं ऋषि पंचमी पर भी विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।


इस तरह मनाई जाती है विश्वकर्मा जयंती

विश्वकर्मा जयंती के दिन कारीगर तथा शिल्पकार अपने घर, ऑफिस तथा कार्यस्थल को साफ-सुथरा बना कर उसे सजाते हैं। इसके बाद उस स्थान को रंगबिरंगे डिजाईनों से सजाया जाता है।

इसके बाद विधिवत तरीके से परिवार तथा कार्य करने वाले स्टाफ सहित विश्वकर्मा की पूजा कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। विश्वकर्मा के साथ ही उनके वाहन वृषभ की भी पूजा की जाती है। कई स्थान जहां विश्वकर्मा की प्रतिमा है, उन पर माल्यार्पण व अन्य प्रकार की सजावट कर पूजा की जाती है। इस पूरे दिन को एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद बांटा जाता है। बहुत से भक्त इस दिन अपने स्टाफ को भी भोजन करवाते हैं और सभी एक पारिवारिक समारोह की तरह इस पूजा का आनंद लेते हैं। कई स्थानों पर विश्वकर्मा जयंती के दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा है।


विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Importance of Vishwakarma Puja)

वेदों में विश्वकर्मा को तकनीकी ज्ञान-विज्ञान का ज्ञाता बताया गया है। महाभारत मे वर्णित की गई भगवान कृष्ण की नगरी द्वारिका का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था। उन्हें देवताओं का शिल्पकार माना जाता है तथा सृष्टि की सर्वोत्तम कृतियों के निर्माण का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। माना जाता है कि उनकी आराधना से कॅरियर में तरक्की मिलती है तथा तकनीकी काम करने वालों के लिए भाग्य के द्वार खुल जाते हैं। कहीं-कहीं पर उन्हें ब्रह्मा का पुत्र भी कहा गया है। वास्तु विज्ञान, शिल्पकला, भवन निर्माण कला ये कुछ ऐसी विध्या है जिनमें एक्सपर्टाइज प्राप्त करने के लिए विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।

पूरे भारतवर्ष में विश्वकर्मा पूजा के दिन उनके भक्त यथा कारीगर, सुनार, लोहार, शिल्पकार, वास्तुकार अपने औजारों की पूजा करते हैं। इसके बाद उनकी पूजा कर उनसे सुख तथा समृद्धि देने की प्रार्थना की जाती है।

ऋग्वेद में विश्वकर्मा की स्तुति की गई है। उनकी पूजा कर भक्त ज्ञान की प्राप्ति तथा अपनी विद्या में संपूर्णता का वरदान मांगते हैं। उनकी पूजा न केवल मध्यम वर्ग अथवा निम्न वर्ग करता है वरन उच्चकुलीन वर्ग भी उनकी पूजा में बढ़-चढ़कर भाग लेता है।

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वर्ष 2022 में विश्वकर्मा पूजा की तिथि एवं शुभ मुहूर्त (Vishwakarma Puja dates 2022 and Muhurat)

विश्वकर्मा पूजा की तिथि – 17 सितंबर 2022 (शनिवार)
विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त – 7:36 AM


विश्वकर्मा पूजा का इतिहास (History of Vishwakarma Puja)

पौराणिक साहित्य में कहीं-कहीं विश्वकर्मा को इन्द्र तथा सूर्य भी कहा गया है। इससे अनुभव होता है कि ये एक ही देवता है जो कालांतर में अलग-अलग नामों से पूजे जाने लगे। सूर्य अथवा इन्द्र के रूप में विश्वकर्मा को सम्पूर्ण विश्व का रक्षक माना जाता है। हिंदू के प्रमुख देवता ब्रह्मा को उनका पिता माना जाता है।

विश्वकर्मा कौन हैं? (Who is Vishwakarma)
हिंदुओं के पौराणिक साहित्य के अनुसार विश्वकर्मा की कई भुजाएं हैं। वह शीश पर मुकुट धारण करते हैं, उनके हाथों में एक पेड़ की शाखा तथा कई औजार हैं। ऋग्वेद में उन्हें सृजन का देवता माना गया है। सभी शिल्पकार, धातु विद, सुनार, कारीगर, बढ़ई आदि तकनीकी कार्य करने वाले समाज उन्हें अपना ईष्टदेव मान कर उनकी स्तुति करते हैं। कहा जाता है कि वह 64 विद्याओं में प्रवीण हैं एवं उन्होंने ही सर्वप्रथम स्थापत्य वेद से दुनिया का परिचय करवाया था। उनके कई हाथ तथा उनमें स्थित वस्तुएं उनकी बहुमुखी प्रतिभा युक्त चारित्रिक विशेषताओं को दर्शाती हैं।

प्राचीन पुराणों तथा ग्रन्थों में उन्हें देवताओं का शिल्पकार कहा गया है। वह देवताओं के लिए रथ बनाते हैं, उनके लिए अस्त्र-शस्त्र बनाते हैं। उन्होंने महर्षि दधीचि की हड्डियों से इन्द्र के लिए वज्र बनाया था, भगवान कृष्ण का चक्र भी उन्हीं के द्वारा निर्मित किया गया था।

रामायण में रावण की नगरी लंका का वर्णन आता है। लंका समुद्र के बीचोंबीच बसी हुई अजेय नगरी थी तथा पूरी तरह से स्वर्ण से निर्मित थी। रामायण में कहा गया है कि स्वर्णनिर्मित लंका का निर्माण विश्वकर्मा ने भगवान शिव तथा उनकी भार्या मां पार्वती के लिए किया था। परन्तु नगरी की शोभा देखकर रावण का मन ललचा गया। उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या की एवं वरदान के रूप में लंका को ही मांग लिया। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर लंका उसे दान में दे दी। इसके बाद उसने लंका को अपनी राजधानी बनाया। किंवदंती है कि आज का श्रीलंका ही रावण की नगरी लंका है।

पांडवों के लिए इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया था विश्वकर्मा ने (Vishwakarma Created Indraprashtha and Dwarika)
महाभारत की कथा में पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ का वर्णन आता है। कहा जाता है कि हस्तिनापुर के पास एक खांडव नामक वन था, जिसमें भयानक राक्षस और जीव-जंतु निवास करते थे। भीम और अर्जुन ने इस पूरे जंगल को अग्नि देव की सहायता से जला कर राख कर दिया था। इसके बाद उस स्थान पर विश्वकर्मा ने इन्द्रप्रस्थ नामक नगर का निर्माण किया था। नगर में पांडवों के लिए एक मायावी महल का भी निर्माण किया गया था, जिसमें जल और दीवारों के बीच का भेद नहीं दिखाई देता था। इसी महल में दुर्योधन भ्रम में पड़ कर पानी के कुंड में गिर गया था जिस पर द्रौपदी ने अंधे का पुत्र अंधा कह कर उसका अपमान किया था। अपने इसी अपमान के प्रतिशोध के लिए दुर्योधन ने दुशासन को भरे दरबार में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने की आज्ञा दी थी, जिसके फलस्वरूप पांडवों तथा द्रौपदी ने कौरवों के नाश की प्रतिज्ञा की और महाभारत का युद्ध हुआ।

इसी प्रकार महाभारत में ही वर्णित की गई भगवान कृष्ण की नगरी द्वारिका का निर्माण भी विश्वकर्मा द्वारा ही किया गया था। भगवान कृष्ण के वापिस बैकुंठ जाने के बाद उनकी नगरी समुद्र में डूब गई थी। आज भी उसके अवशेष पाए जाते हैं। हिंदू धर्मावलंबियों के लिए द्वारिका पवित्र धाम माना जाता है।

विश्वकर्मा को चार युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग का निर्माता भी माना गया है। विश्वकर्मा का अर्थ ही है विश्व को रचने वाला। देवशिल्पी के रूप में पूरे स्वर्ग की रचना भी विश्वकर्मा द्वारा ही की गई थी।


विश्वकर्मा पूजा क्यों की जाती है?

भारत के सनातन धर्म में विश्वकर्मा को महान यंत्रकार (इंजीनियर) माना जाता है जो किसी भी वस्तु का निर्माण पलक झपकते कर सकते हैं। उन्हें देवशिल्पी मान कर उनका आशीर्वाद लेने के लिए भादौ माह (हर वर्ष लगभग सितंबर माह के आसपास) में उनकी आराधना की जाती है।

विश्वकर्मा को एक डिजाईनर, शिल्पकार, संगीतकार, दैवीय अस्त्र-शस्त्र, देवताओं के रथ सहित कई अन्य अद्भुत वस्तुओं का निर्माणकर्ता बताया गया है। विश्व को वास्तुशास्त्र तथा स्थापत्य कला देने वाले विश्वकर्मा की आराधना से उनके ही समान कार्यकुशलता प्राप्त होती है। उनके भक्त उन्हें अद्भुत तकनीकों का रचियता मान कर उनसे वरदान लेने की कामना करते हैं।

आसान भाषा में हम कह सकते हैं कि विश्वकर्मा जयंती और विश्वकर्मा पूजा को भारतीय जनमानस स्वयं को तकनीक के प्रति जागरूक बनाने तथा ज्ञान प्राप्त करने की ओर बढ़ने के एक अवसर के रूप में देखता है। इससे व्यक्ति को अपने कार्य में लगातार जुटे रहने तथा उसमें विशेषज्ञता प्राप्त करने की लगन जागती है ताकि वह अपने कॅरियर एवं जीवन में कुछ अच्छा कर पाएं।